सुशांत सिंह राजपूत केस में हर दिन नए खुलासे हो रहे हैं। कभी बिहार पुलिस तो कभी मुम्बई पुलिस, कभी बिहार सरकार तो कभी महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कोई न कोई ऐसा बयान आ रहा जिससे यह केस हर दिन एक नई दिशा लेता है, कुछ ऐसा नयापन आता है जो सोचने को मजबूर कर देता है कि आखिर सच है? यह केस अब बिहार सरकार के लिए नाक की लड़ाई है और हो भी क्यों न इंसाफ सब को चाहिए, सुशांत का बिहार से रिश्ता है सिर्फ यही एक वजह नही बल्कि हर किसी के लिए इंसाफ की बात होनी चाहिए। बॉलीवुड में सुशांत की तथाकथित आत्महत्या को लेकर पहले ही काफी बहस हो चुकी है। उनकी गर्लफ्रैंड रिया चक्रवर्ती सही कई लोगों का नाम भी उछाला जा चुका है लेकिन मीडिया ट्रायल की जगह सरकारें इसे आसान बना सकती थी।

खैर यह तो बात हुई कि क्या हुआ और क्या होना है या चाहिए? इसी बीच एक लेख पर हाय तौबा मच गया। मुझे इस लेख में अटपटा बहुत कुछ नही लगा लेकिन हां कुछ चीजें कुछ बातें ऐसी हैं जिनसे बचना चाहिए जो जाने-अनजाने ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे लेख का यह हिस्सा सच्चाई कम और किसी को डिफेंड करने का या मीडिया ट्रायल का हिस्सा ज्यादा लगा। माफ कीजिये लेकिन जब तक जांच नही पूरी हो जाती किसी को भी सीधे सीधे आरोपी और दोषी बता देने का अधिकार तो कम से कम हमें नही है। जितना हमने देखा सीखा है उससे यही समझ आता है कि हमारा काम खबरों को ‘अविधा’ यानि ‘जैसा दिखा वैसा लिखा’ जैसा होना चाहिए। उसमे ओपिनियन के लिए कोई जगह या गुंजाइश हमेशा नही होती।

अब आते हैं कि आखिर इस लेख में है क्या और क्यों ट्विटर पर कई बड़े नेता सहित अन्य लोग इसे लपक बैठे और एक नई बहस छेड़ दी। बहस का मुद्दा था ‘बिहारी’, जी हां सच कहूं तो यह सुनने में हास्यास्पद है क्योंकि किसी एक कि टिप्पणी वह भी एक मुद्दे पर बिहारी और बिहारियों को डिफाइन करने को बहुत छोटी सी चीज प्रतीत होती है।दरअसल यह पूरा विवाद उस एक लेख से शुरू हुआ जिसका शीर्षक है, “सुशांत सिंह राजपूत और विषाक्त बिहारी परिवारों में ‘श्रवण कुमार’ होने का बोझ।”

इस लेख में कई बातों को आधार बनाते हुए एक कोशिश की गई है इस परिवेश और समझ को समझने और समझाने की, इसमें नयापन से कुछ नही बल्कि कोई भी व्यक्ति जो इस परिवेश में रहा है उसको इस बात का आभास बड़ी ही आसानी से हो सकता है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बात करें तो ज्योति लिखती हैं कि बेटा हमेशा मेरा लाडला यानि बच्चा ही रहता है। दूसरा पॉइंट है। गर्लफ्रैंड या बीबी बेटे से परिवार को दूर कर देती हैं। तीसरा पॉइंट है परिवार गर्लफ्रैंड को स्वीकार नही कर सकते। चौथा पॉइंट है परिवारिक डिसकनेक्ट। पांचवा पॉइंट है डिप्रेशन को हार की तरह देखा जाता है, असाध्य सा। छठा और आखिरी पॉइंट है काला जादू। 

इन छह पॉइंट्स को जब आप ध्यान से देखेंगे तो इस लेख में गलत कुछ नही और जो कुछ लिखा आ वह काफी हद तक सच है। बस यहां हर पॉइंट को सुशांत उनके पिता, उनकी गर्लफ्रैंड से जोड़ते हुए व्याख्या करना शायद नागवार गुजरा है। मैं लेख के सभी बातों से सहमत नही जैसा मैंने कहा काला जादू और डिप्रेशन असाध्य है यह आज के वक़्त में देहात यानि पिछड़े से पिछड़े इलाके के लोग भी नही मानते हैं। कई छोटे शहरों के बच्चे बड़ा नाम बना रहे। तमाम दुश्वारियों के बीच वह आगे बढ़ रहे हैं।

बिहार और बिहारियों ने अपने दम पर बहुत कुछ हासिल किया है इसलिए यह व्याख्या गले नही उतरती है। गर्लफ्रैंड या बीबी परिवार से दूर कर देते हैं यह सोच लाजमी है बदलते परिवेश में परिवार से दूरी बढ़ी है और बिहार या यूपी के किसी छीटे से कस्बे या बड़े शहर से अगर आप निकल कर आ भी गए मेट्रो सिटी में तब भी आप अपने परिवार को इसके लिए राजी कर लेंगे की आपकी कोई गर्लफ्रैंड है और आप आगे उसके साथ जीवन बिताना चाहते हैं यह टेढ़ी खीर है।

माँ के लिए बेटा बच्चा या लाडला होता ही है यह बिहार नही पूरी दुनिया मे जहां भी मानव सभ्यता है वहां के लिए यही एक अकाट्य सत्य है और शायद रहेगा। रही बात इन सामाजिक बातों को सुशांत से जोड़ने का तो सुशांत न गाँव से थे न ही वह मध्यम वर्गीय परिवार का हिस्सा रहे। यह सारी मान्यताएं ज्यादातर ग्रामीण इलाके की हैं।

रही बात श्रवण कुमार बनने की तो बिहार यूपी में संयुक्त परिवार का इतिहास देखिये, संख्या देखिये जब पूरी दुनिया मे एकल परिवार की प्रविर्ती बढ़ी तब भी बिहार यूपी में सामाजिक और पारिवारिक ताना बाना बना रहा और यह एक उदाहरण है। इसमें कुछ गलत नही है। लेख में लिखी बातें सुशांत के केस के सिलसिले में बेशक थोड़ी अजीब लगती हैं लेकिन बिहार के संदर्भ में कहीं न कहीं एक कड़वी सच्चाई है। कड़वा लगने का कारण भी यही था वरना आज तक क्या मजाल की हमने लाख दुर्गति सह कर सरकार से सवाल किया हो? क्या मजाल की रोजगार, बिजली, सड़क पानी की बात की है? बाकी छोड़िये कोरोना और बाढ़ तक से हमें दिक्कत नहीं है?