आत्महत्या के भयावह आंकड़े आज देश की उस काली सच्चाई को बताते नजर आते हैं जिसमे सिर्फ नारे में किसान और जवान की याद आती है। सिर्फ नारे में उन्हें सराहा जाता है। वोट के लिए उनका उपयोग होता है और उनकी भलाई के लिए हमेशा झूठे वादों का सहारा लिया जाता है। जब जय जवान जय किसान का नारा दिया गया था तब शायद यह क़तई नही सोचा गया होगा कि देश के यह दो वर्ग आने वाले समय मे आत्महत्या के आंकड़ों में सबसे आगे होंगे।


आज की यह एक कड़वी सच्चाई है, जिसमे सबसे ज्यादा किसान और जवान आत्महत्या करते हैं। कारण के नाम पर किसानों के लिए कर्ज और जवानों के लिए मानसिक दबाव को जिम्मेदार बताया जाता है। लेकिन आज तक यह किसी ने नही बताया कि कर्ज क्यों नही चुका पाता या मानसिक दवाब क्यों हो जाता है। जवान और किसान अपनी अपनी जगह दिन रात मेहनत करते हैं लेकिन जब सरकारी मदद की बात आती है तो सरकारें बस वादों के लॉलीपॉप का सहारा लेती नजर आती है।


किसानों को उनके फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नसीब नही, न आसानी से कर्ज न खाद न पानी तो किसान क्या करें? जवानों को सिर्फ ड्यूटी भर के लिए इस्तेमाल किया जाता है, न खाने के नाम पर शुद्ध और सही खाना है न पीने को पानी, न तो उसके परिवार को किसी भी तरह की कोई मदद मिलती है, न समय से छुट्टी तो जवान क्या करें। सोचिए, समझिए आप हो सकता है अपने एसी लगे कमरे में आराम से बैठे हों लेकिन खाने के लिए अन्न न मिले तो सोचिए क्या होगा? सुरक्षित कैसे बैठे हैं यह भी सोचिए कि जवान न हों तो आपका क्या होगा? साथ ही फुरसत हो तो इनकी कहानी को अपने दिमाग के एक कोने में जगह दीजिये और दयनीय स्थिति को समझिए। 

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