फरवरी और मार्च का महीना विद्यार्थियों के लिए खास होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्ही महीनों में बोर्ड की परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। यह महीना उनकी साल भर की मेहनत को आंकने का होता है। यह सब आसान नही होता क्योंकि परीक्षा में शामिल होने वाले हर विद्यार्थी के मन मे एक अजीब सा भय होता है।

यह भय सफलता और असफलता को लेकर, परिवार और माता पिता की उम्मीदों को लेकर, शिक्षकों की उम्मीदों को लेकर और इन सब से कहीं ज्यादा समाज को लेकर होता है। यह दबाव विद्यार्थियों के लिए कहीं से उचित नही होता यह सभी समझते हैं लेकिन इसके बावजूद इसे कम करने के लिए शायद कुछ नही किया जाता जिसका नतीजा कभी कभी दुखद होता है।


यही वजह है कि परीक्षाओं के इस दौर के शुरू होने के साथ विद्यार्थियों के आत्महत्या करने की खबरें भी कुछ ज्यादा आने लग जाती हैं। विद्यार्थी उम्मीदों का बोझ, पढ़ाई का बोझ उठाने में खुद को असमर्थ समझने लगते हैं और सफलता पाने की होड़ में पीछे छूट जाने के भय से, परिवार के डर से आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। इन चीजों से बचने की जरूरत है।

हर बच्चे की एक सीमित क्षमता है, उसकी अपनी इच्छा है और अनावश्यक दबाव देना कहीं से सही नही है। इसके अलावा उससे बातचीत करें, अपनी बातें न थोपें, उसे और उसकी पसंद, नापसंद को समझने की कोशिश करें। उसका साथ दें और उत्साह बढ़ाएं। आपकी यह कोशिश बच्चे का जीवन बचा सकती है। और बच्चा आपकी इच्छा, आपकी इज्जत तभी पूरी करेगा जब वह सलामत रहेगा। आत्महत्या के यह मामले दुखद और गंभीर होने के साथ समाज के लिए कतई उचित नही हैं। सोच कर देखिए।

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