बिहार को राजनीति का रिसर्च सेंटर कहा जाता है। जब भी बात राजनीति में बदलाव की आई हो, जब भी जात-धर्म, मंडल-कमंडल की राजनीति सुगबुगाहट हुई। बिहार अगुआ रहा। जहां चाणक्य ने चंद्रगुप्त को सबसे बड़ी सत्ता सौंप दी थी। अब क्या वही बिहार एक और बदलाव का वाहक बनेगा? क्या दिल्ली की जीत का असर बिहार में देखने को मिलेगा? क्या नीतीश के चेहरे पर प्रशांत किशोर भारी पढ़ेंगे। एक कहावत है घर का भेदी लंका ढाये। खैर यह बाद में स्पष्ट करता हूँ। फिलहाल दो चेहरों की बात कर लेते हैं ।


पहला चेहरा वह है जिसने प्रत्यक्ष तौर पर कुछ हासिल नही किया है लेकिन पर्दे के पीछे से मोदी, नीतीश, कैप्टेन अमरिंदर सिंह, जगन मोहन रेड्डी और हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने में कामयाब रहा है। नाकामी के नाम पर महज यूपी एक उदाहरण है। आगे वह ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन के लिए रणनीतिकार के तौर पर काम कर रहे हैं। वह एक समय मे जहां मोदी के करीबी रहे और बाद में नीतीश के घर जिनका सालों रहना हुआ और जदयू में नंबर दो की हैसियत रही वह बड़े ही बेआबरू होकर निकले, यह कहें तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी।


हम बात कर रहें हैं कभी ममता तो कभी केजरीवाल के नजदीक नजर आने वाले प्रशांत किशोर की। कैग से शुरुआत कर IPAC को देश का सबसे बड़ा चुनावी नाम बनाने वाले चेहरे का नाम है प्रशांत किशोर। अब बात दूसरे चेहरे की जो जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रहा, ऊंची जाति से है, देशविरोधी नारों के लिए बदनाम है( वाकई या कहने को यह आप तय कर लें), केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ लगातार खड़ा रहा है, गिरिराज सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ हार चुके हैं और अब अब सीएए के विरोध के सबसे बड़े प्रतीक के तौर पर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। इससे क्या हासिल हुआ यह तो वही जानें लेकिन उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़, उनपे बौखलाए लोगों के लगातार हमले और मीडिया कवरेज ने कन्हैया को एक चेहरे के रूप में स्थापित तो कर ही दिया है।


अब दो चेहरों की बात यहाँ क्यों जरूरी है? बिहार में नीतीश के सामने न अब लालू जैसा कोई कद्दावर चेहरा है न तेजस्वी के चेहरे से खुद उनके दल और समर्थकों को उम्मीद रही है। 2019 लोकसभा के बाद से गिने चुने मौके पर ट्विटर पर दिखने वाले तेजस्वी कमोबेश राहुल गांधी की राह चलते नजर आ रहे हैं। इसके अलावा वह जरूरी मुद्दों को पूरी ताकत से उठाने और जनता में अपनी बात पहुंचाने में भी विफल रहे हैं। ऐसे में नीतीश के सामने जहां तेजस्वी से ज्यादा बड़ी चुनौती कन्हैया दिख रहे हैं वहीं प्रशांत जैसे रणनीतिकार का अगर उन्हें साथ मिल गया तो राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। एक समय में My समीकरण, तो कभी मंडल-कमंडल वाली राजनीति का हश्र बिहार के लोकसभा नतीजे पहले ही बता चुके हैं।


कन्हैया का आक्रामक राजनीतिक अंदाज़ और प्रशांत की आक्रामक रणनीति के अलावा बिहार में कमजोर विपक्ष इन दोनों की राह आसान बना सकता है। इसके अलावा नीतीश कुमार के पहले कार्यकाल को छोड़ दें तो पिछले 10 सालों में इस सरकार के हिस्से उपलब्धियों से ज्यादा नाकामियों की फेहरिस्त है। शराबबंदी का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार के राज्य में सरकार अपराध और शराब के अवैध कारोबार का अड्डा बन चुका है, एक भी प्रतियोगी परीक्षा ऐसी नही बीती जो बिना विवाद के समाप्त हुई, हर दिन आपराधिक घटनाओं से अखबार लाल होते हैं, शिक्षा व्यवस्था की हालत सभी को पता है, सात निश्चय के साथ 2015 मे आई सरकार की हालत किसी से छुपी नही है। ऐसे में कहा जा सकता है हर साल बाढ़ और सूखे से जूझने वाली बिहार की जनता अगड़े-पिछड़े लालू-नीतीश से आगे बढ़ कर एक नए विकल्प का रुख कर सकती है।


प्रशांत नीतीश के एक समय काफी करीबी रहे हैं ऐसे में उनसे रणनीति और राजनीति का शायद ही कोई ऐसा राज छुपा हो जो प्रशांत न जानते हों। बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के लिए मशहूर नीतीश के लिए यही बड़ी गलती साबित हो सकती है। इसके अलावा राजनीति में बेशक हम प्रशांत को नौसिखुआ कह लें या नीतीश के सामने उनका कद राजनीति में बहुत बौना है मान भी लें लेकिन यह पक्का है चुनावी प्रचार के महारथी और युवाओं की नब्ज लगातार टटोलने वाले प्रशांत अगले छह महीने में राजनीति में कुछ बदलाव तो ला ही सकते हैं। कुछ हो न हो यह चुनाव बिहार में जात-धर्म के नाम पर न लड़ा गया अगर तो यही उनकी जीत होगी। बाकी यह तय है न सिर्फ बिहार बल्कि देश की राजनीति में यह दोनो नाम लंबी रेस के घोड़े साबित होंगे। हालांकि कभी मोदी, कभी नीतीश, कभी ममता तो कभी कांग्रेस की विचारधारा के साथ चल अलग-अलग दलों के लिए रणनीति बनाने की वजह से उनकी स्वीकार्यता पर फर्क जरूर पड़ेगा। बाकी कल तक प्रशांत को सुनने का इंतजार कर उनकी रणनीति को समझने का प्रयास करें।