वह पगली आज फिर रुला गई,
भरोसे की सीमा रेखा शक की बिनाह पर लांघ गई,
सबूत, बात सब भूल गई,
प्यार, जज्बात, सोच समझ सब तज गई,
एक पल में पराया बना गई, आज वह फिर रुला गई-2

उसके लिए हम न जानें कितने बदल गए,
न जाने कितने सुधर गए,
हमारे चर्चे कभी अखबारों में थे,
आज हम कुछ लोगों तक सिमट गए,
फिर भी वह समझ न पाई,
आज वह पगली फिर रुला गई।

वैलेंटाइन पर ऐसे तो भरोसा नही फिर भी इसे वह खास बना गई,
शक कर वह पुरानी बातों, यादों की याद दिला गई,
हर बड़े बवाल थकान के बावजूद भी हर तरजीह खुद को दिला ले गई,
रात की नींद उड़ा ले गई,
वह पगली आज फिर रुला गई-2

पिछले कई सालों से उसके हैं, यह वह भी जानती है,
इसके बावजूद वह एक पल में बेगाना बना गई,
जिसके बिना सुबह नही होती,
जिसके बिना कभी शाम नही होती,
वह अकेलेपन का एहसास करा गई,
एक बार फिर वह पगली मुझे रुला गई-2

जिसका वालपेपर सालों से मेरे फ़ोन की शोभा है,
जिसकी बातें ही मेरे हंसने-रोने का वादा है,
जिसकी वजह से हर सुधार हुआ,
जिसकी वजह से एक बदनाम, गुसैल बिगड़ा बदनाम लड़का बहुत बदला शरीफ बना,
जाने अनजाने न जाने कितना बदल गया और कितना बदलेगा,
यह सब एक मैसेज की वजह से भूल गई,
आज वह पगली फिर रुला गई-2

थकान, छुट्टी, आराम, मजाक, हंसी, उदासी जिसके बिन सब अधूरी है,
पतवार बिन जैसे नाव हमारी है,
तुमसे ही सब है, तुम बिन हमारी हस्ती अधूरी है,
सब पाकर भी अकेले हो जाते हैं, कास यह वह समझ पाती,
तो आज वह फिर हमें न रुलाती-2

खैर उम्मीद है एक दिन समझ जाएगी,
आज नही तो कल सुबह तक मान जाएगी,
जानता हूँ ज्यादा देर नाराज नही रह सकती,
आज रुला गई लेकिन सालों तक वही पगली हंसाएगी।

-विजय