एक दो दिन पहले देश के गृह मंत्री अमित शाह को एक निजी चैनल के मंच पर सुन रहा था। उनसे कई सवाल हुए और तकरीबन 56 मिनट तक वह लॉजिक के साथ हर सवाल का जवाब देते रहे। एंकर महोदय चुप से नजर आए। खैर अब बात ऐसे मुद्दे की जहां न चुप्पी साधना सही है न बोलकर हम सत्ता में बैठे लोगों का कुछ बिगाड़ सकते हैं।

ऐसे में याद आते हैं अन्ना और एक कानून जिसकी जरूरत वक़्त-बेवक्त महसूस होती है। राइट टू रिकॉल मतलब अगर जनता को अगर उसका जनप्रतिनिधि मंजूर नही है तो उसे जनता पद से हटा सकती है। यह ठंडे बस्ते में है और क्या उम्मीद करें उन राजनीतिक दलों से जहां बाहुबल और अपराध का बोलबाला है। जीतने वाले के साथ टिकट के दावेदारों, निर्दलीय उम्मीदवारों पर नजर डालें तो चुनाव में कमोबेश हर दल में यही हैं।

अब मुद्दे की बात करते हैं, टाइटल के हिसाब से बात प्रियंका गया गांधी वाड्रा की हो रही है। कोटा के जे के लोन अस्पताल में मासूम बच्चों की मौत की हो रही है। अब तक एक महीने में सैकड़ों बच्चे मौत के मुंह मे जा चुके हैं। सत्ता में कांग्रेस है। सीएम कह रहे हैं कि ऐसा होता है। स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा कह रहे हैं क्या फर्क पड़ता है? ऐसे में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की मासूमियत बरबस याद आ गई। राहुल गांधी इसलिए अध्यक्ष बने क्योंकि वह गांधी परिवार के इकलौते वारिस हैं और प्रियंका गांधी इसलिये बैकअप प्लान हैं क्योंकि उनकी शक्ल इंदिरा गांधी से मिलती है।

खैर, यह वही प्रियंका गांधी हैं जिन्हें यूपी की संवेदनहीन सरकार की चिंता है, बर्बरता दिखती है लेकिन कोटा के मासूम जिंदगियों के जीवन मे उनकी ही सरकार की जर्जर व्यवस्था, निक्कमेपन और असफलता के कांटे नही नजर आ रहे हैं। यह वही राहुल गांधी हैं जो राफेल और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे “गैर जरूरी” मुद्दे पर गला फाड़ते तो दिखते हैं लेकिन हर अहम और विवादित फैसले से पहले वर्ल्ड टूर या यूं कहें अज्ञातवास पर चले जाते हैं।

कोटा के इस अस्पताल के बारे में छपी रिपोर्ट की बात करें तो 19 में से 13 वेंटिलेटर खराब हैं,111 में से 81 इंफ्यूजन पम्पस खराब हैं, 71 में से 44 वार्मर खराब,38 में से 32 ऑक्सिमिटर्स खराब हैं, 28 में से 22 नेबुलाइजर खराब हैं। यह आंकड़ा सुविधा और जीवन रक्षक यंत्रों का है। अस्पताल में सुवरों का रैन बसेरा है। शीशे टूटे पड़े हैं। गंदगी अपार है। यह मुमकिन है। गोरखपुर हो या कोटा क्योंकि हम इसके आदि हैं। सवाल सत्ता, पक्ष या विपक्ष का नही है। सवाल है कि अंधेरगर्दी और चौपटनगरी के आदि हम इस हद तक हो चुके हैं कि आंसू बहाने को हम अपनी तकदीर और तकरीर समझ बैठे हैं।

जब तक खुद पर न बीते दर्द समझ नही आता, जब गोरखपुर में बच्चे मरे हम राजनीतिक दलों और सत्ता से ज्यादा तथाकथित तौर पर डॉक्टरों के धर्म मे उलझे रहे। जब बिहार में बाढ़ आई हम राजनीतिक विफलता, संसाधन और प्रशासन के निकम्मेपन की जगह नदियों के प्रलय रूपी हेडलाइंस में उलझे रहे। बेरोजगारी और भुखमरी के दौर में राम मंदिर, सीएए, तीन तलाक़, पकौड़ा और पाकिस्तान में उलझे रहे, दीपावली के दौर में पॉल्युशन के जगह चीनी झालर में उलझे रहे।

मतलब बीमारी कुछ और, इलाज कुछ और हमारी नियति बन चुकी है और हम इसे ही अपनी नियति मान बैठे हैं। वरना कम से कम अंजाम जो हो हम गुमराह तो कम से कम न होते। खैर राजनीति को छोड़िए क्योंकि इनके बस की जब प्याज की कीमतें नही हैं तो बाकी क्या ये घंटा संभालेंगे।

हम भारतीयों की आदत है कि अगर पड़ोसी का लड़का इंजीनियर बन बहुत तरक्की कर गया तो बेशक अपने लड़के का मैथ में हाथ तंग हो हम उसे इंजीनियर बनने में सब झोंक देते हैं। वैसे ही राजनीति की यह विरासत है अंग्रेजों से फुट डालो राज करो का मंत्र दिया वही कॉपी पेस्ट चल रहा है। सॉल्व करने के ट्रिक बदले सवाल वहीं खड़ा है। मौन साधिए और आगे बढ़िए, बिगाड़ आप ऐसे भी कुछ नही सकते हैं।