जयंती विशेष-लाल बहादुर शास्त्री

आज 2 अक्टूबर है इस दिन भारत के दो महापुरुषों की जयंती है। आज ही के दिन जहां पूरे देश मे गांधी जयंती मनाई जाती है वहीं दूसरी तरफ माँ भारती के लाल और पूर्व प्रधानमंत्री और सभी के लिए आदरणीय लाल बहादुर शास्त्री को भी श्रद्धा के फूल अर्पण कर याद किया जाता है।

लाल बहादुर शास्त्री का जन्म उत्तरप्रदेश के मुग़लसराय में 2 अक्टूबर 1901 को हुआ था। बचपन मे ही पिता का साया सर से उठ गया लेकिन गरीबी से लड़ते,जूझते और मुश्किलों का सामना करते हुए भारत के सर्वोच्च पदों में से एक प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए। गरीबी को करीब से देखने का उदाहरण इससे समझ मे आता है कि स्कूल जाने के लिए वह उफनती नदी को पार कर जाते थे क्योंकि नाविक को देने के लिए उनके पास पैसे नही होते थे।

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन का सार था सादा जीवन उच्च विचार और ईमानदारी।इसके कई किस्से भी प्रचलित हैं।ऐसे ही कुछ उदाहरण हम आपको बताएंगे जिससे आप भी ऐसे प्रधानमंत्री पर गर्व करेंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री जी अपबे फटे कुर्ते को छुपाने के लिए ऊपर से बंडी पाह लेते थे और जब यह बिल्कुल पहनने के लायक नही होता था तो पत्नी से इन कुर्तों को काटकर रुमाल बनाने को कहते थे।आज के राजनीतिज्ञों में ऐसी सादगी मिलनी नामुमकिन नजर आता है।आज तो दिखाने की परंपरा है। ऐसे में एक दिन में चार बार कपड़े बदले जाते हैं।

शास्त्री जी न सिर्फ गांधी को आदर्श मानते थे बल्कि उनके बताए रास्ते पर चलते भी थे यही वजह है कि अपनी शादी के समय दहेज में उन्होंने खादी के कपड़े और चरखे की मांग की थी। लोग भी शास्त्री जी को काफी आदर देते थे इसका उदाहरण यह है कि जब देश अन्न की कमी से जूझ रहा था तो लोगों ने शास्त्री जी के कहने पर हफ्ते में एक दिन उपवास रखना शुरू कर दिया था।हालांकि अहिंसा पर विचार थोड़े अलग जरूर थे वहः कहते भी थे अहिंसा परम धर्म है लेकिन देश हित के लिए अहिंसा छोड़ कर हिंसा करना भी जायज है।

शास्त्री जी जब प्रधानमंत्री बने और अपने घर बनारस जाने की इच्छा जताई तो प्रशासन ने तैयारी शुरू कर दी इस दौरान देखा गया कि उनके घर तक जाने वाली गली काफी संकीर्ण है और इस वजह से सुगम आगमन मुश्किल होगा,इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों ने कुछ घरों को तोड़ने का फरमान जारी कर दिया लेकिन जैसे ही यह बात शास्त्री जी तक पहुंची उन्होंने इससे इनकार कर दिया और आदेश दिया कि किसी का भी घर न तोड़ा जाए।

प्रधानमंत्री रहते शास्त्री जी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी या पारिवारिक काम के लिए कभी भी सरकारी वाहन या तंत्र का उपयोग नही किया।न ही उन्होंने कभी भी वीआईपी सुविधा का लाभ लिया।और तो और उनके द्वारा ली गई कार के कर्ज को उनके बेटे ने उनके निधन के बाद चुकाया था।ऐसी भी कई अनसुनी बातें उन्हें आदर देने को बाध्य करती हैं। 

छोटे कद के बड़े प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अपने कड़े फैसलों और दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए भी जाने जाते थे।इसका उदाहरण 1965 में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध का एलान और भारतीय सेना का लाहौर तक पहुंचना खुद दे जाता है। इसके पीछे एक और कारण है।यह कारण था उनके द्वारा दिया गया वह नारा जो उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय दिया था।यह नारा था जय जवान-जय किसान।उनका मानना था कि किसान और सैनिक ही देश के भाग्य विधाता हैं।

लाल बहादुर शास्त्री के बारे में जितना लिखा और कहा जाए वह काम ही होगा लेकिन आज तक एक दुख जो सभी भारतीयों को सालता आ रहा है वह है उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का राज आज तक न खुल पाना।इस दौरान कई सरकारें आई और गईं लेकिन श्रधांजलि देकर उन्होंने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री का निधन ताशकंद में तब हो गया था जब वह 11 जनवरी 1966 को भारत पाकिस्तान युद्ध खत्म होने के बाद शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने गए थे। वाकई माँ भारती का यह लाल सबसे सरल और सबसे अलग था।जन्मतिथि पर आकाश भर प्रणाम।

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