राजनीति में इति या अंत नाम कि शब्दावली का कोई प्रयोग नहीं है। हिंदी से लेकर ऑक्सफ़ोर्ड तक कि डिक्शनरी आप पलट लीजिए लेकिन उसमें कोई ऐसा शब्द नही जो भारतीय लोकतंत्र को समझा सके। ऐसा इसलिए नही कि डिक्शनरी लिखने वालों की जानकारी कम है बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि यहां लोकतंत्र का मतलब मजहब, जाति की राजनीति से है।


2019 लोकसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। राजनीतिक दल कहीं गठबंधन के भरोसे तो कहीं अकेले खुद में दम्भ भर रहे हैं, कहीं पूर्व नेता पर बाजी खेली जा रही है तो कहीं कद्दावर नेता जी बेटिकट हो चुके हैं। गठबंधन धर्म के पालन में यह तो होना ही था। हालांकि असली गठबंधन अब तक बुआ और बबुआ का ही नजर आ रहा है, बाकी सब मे कुछ भी फिक्स नही नजर आता है।

अब बात उन लोगों की जो राजनीति के मुद्दे पर सियासी दलों को ज्ञान दे रहे हैं। मसलन इन्हें टिकट मिलना चाहिए था, वह नेता जीत सकता था, इस जाति के वोट के आधार पर फलाना बाबू सही रहते इत्यादि। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि जिन्हें अंतिम बार किसे वोट किया वह याद नही, अपने दल या सांसद की उपलब्धियां और नाकामियां याद नही वह पांच साल के लिए अपना प्रतिनिधि किस आधार पर चुनेगा?


कुल मिलाकर देखें तो बेशक कई बड़े नाम बदनाम हुए। न माया मिली न राम। इज़के बावजूद कुछ शालीनता बरतते नजर आए तो कुछ शब्दों की गरिमा और लहजा भूल बैठे। यहीं जरूरत आती है सच्चे मन से, सही मुद्दों को ध्यान में रख कर प्रतिनिधि चुनने की। वरना इंडिया में फ्री की जानकारी और ज्ञान तो हर गली में भर-भर के मिलती है।बिहार और यूपी का जिक्र यहाँ इसलिए जरुरी है क्योंकि जितनी राजनीति बिहार-यूपी के घर,गाँव,चौपाल और समाज में होती है शायद उतना एक्टिव और कोई राज्य इस मामले में नहीं है.