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देश आज संसद की कार्रवाई के एक अहम पल का गवाह बना। यह कार्रवाई न सिर्फ ऐतिहासिक थी बल्कि विवादित और विपक्ष को एकजुट करने वाली भी थी। काश विपक्ष की यही एकजुटता बेरोजगारी दूर करने के लिए दिखती, काश यही विपक्ष जनता, किसान बेरोजगार के हर उस मुद्दे पर एकजुट दिखता जो जरूरी थे। काश आरक्षण के अलावा भी समाज और देश के उत्थान के लिए यह कभी सोचते तो आज सरकार किसी भी दल की हो, संसद का समय न खराब होता, जनता के करोड़ो रूपये बर्बाद न होते, सार्थक बहस होती दिखती, नतीजे निकलते और अहम फैसलों का साक्षी यह देश बनता, लेकिन नही, माफ कीजिये हम दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था सिर्फ कहने को हैं, समझते हैं लेकिन वास्तव इन सब से ऊपर राजनीति है।


आज जिस तरह तरह पूरा विपक्ष जो दलित, हिन्दू, मुस्लिम, आरक्षण की राजनीति करता है वह एकजुट था। आज वह विपक्ष मोदी सरकार के पक्ष में था जो उसके खिलाफ गठबंधन बनाते नही थक रहा था। आज वह विपक्ष था जो अलग-अलग राज्य, अलग-अलग मुद्दों, अलग-अलग विरादरी का प्रतिनिधित्व करते हुए भी तथाकथित रूप से एक सामाजिक सरोकार के फैसले में हज़ारों लोगों के लिए सरकार के पक्ष में था। हालांकि माफ कीजियेगा जीएसटी और नोटबन्दी भी सही नियत से देश और जनता के पक्ष में लिए गए फैसले थे। तीन तलाक का फैसला भी एक समुदाय की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए था। विदेश यात्रा भी विदेश नीति को सुदृढ करने के लिए था। सर्जिकल स्ट्राइक भी आत्मसम्मान के लिए जरूरी था। लेकिन तब कहाँ थी आपकी एकता, तब कहाँ थी जनता, तब कहाँ थी जनता, तब कहाँ थी आपकी देश और लोकतंत्र के लिए आपकी चिंता?


कल से मैं सोशल मीडिया पर सवर्ण समाज के लोगों और उनसे जुड़े ग्रुप की टिप्पणी पर नजर बनाए हुए था। मैं खुद इसी समाज और देश का हिस्सा हूँ और यह कह सकता हूँ आज जो हुआ वह समाज और देश के लिए एक हद तक जरूरी हो सकता है लेकिन यह वह बैशाखी है जो समाज को विकलांग बनायेगी। यकीन मानिए सरकार ने उस प्रतिभा को पंख देने की जगह बैशाखी थमा दी जो न सिर्फ अपने पर भरोसा और क्षमता रखता है बल्कि यही उसकी पहचान रही है। आप यकीन मानिए जिस दिन देश इस स्वार्थ भरी राजनीति को समझने लगेगा उस दिन आरक्षण, जाति, सम्प्रदाय सब की राजनीति का सूरज अस्त खुद ब खुद हो जाएगा, हालांकि अभी यह सपना है। 


मोदी सरकार को लोगों ने काफी उम्मीदों से चुना था। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन करने और सवर्ण आरक्षण के लिए कोई भी सरकार काफी थी। लोगों ने सरकार रोजगार और अपनी जीवनशैली अच्छी करने को चुनी थी। गाय, गोबर, अव्यवस्था, आरक्षण के लिए नही। पता नही इस सरकार से किसने क्या उम्मीद की थी और क्या पूरी हुई लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसी वजह से कांग्रेस को रिप्लेस करने में और किसी और दल को भारतीय राजनीति के शीर्ष पर पहुंचने में 60-70 साल का वक़्त लग गया। आप अपने जमीर से अपने आप से अपने समाज अपने देश की भाषा समझिए, पूछिये की क्या इसी के लिए आपने सरकार चुनी थी? क्या यही मुद्दा अहम होगा? क्या राजनीति इन्ही मुद्दों पर होगी, क्या आरक्षण की बैशाखी से भारत को सुपर पावर बनाने का ख्वाब देखते हैं आप? अगर हां तो माफ करना हम मानसिक गुलाम आज भी हैं, पहले भी थे और इसी ढर्रे पर चले तो पता नही कब तक रहेंगे?