भारत देश की पहचान एक ऐसे राष्ट्र की है जहां अलग-अलग सभ्यताएं हैं, अलग भाषाएं हैं, अलग संस्कृति है और अलग संस्कार हैं। राजनीति के केंद्र अलग हैं,दल अलग हैं, समझ,सोच और स्वीकार्यता अलग है। मुद्दें अलग हैं और हर वह बात अलग है जो इस बार चरितार्थ होती दिखी। कहने का तात्पर्य बस इतना है न बीजेपी के काम बजरंगबली आये न अली आये? बयानों के तीर के बीच मतदाताओं की मर्जी चली, बीजेपी की नफरत वाली बोली के बीच राहुल के वादे और कांग्रेस के इरादे चले, नफरत और द्वेष के बीच किसान और युवाओं की बात चली। खुशी और दुःख का कहीं मंजर चला तो कही राजनीति ही राजनीति चली। तात्पर्य यह है कि बीजेपी के खिलाप कॉंग्रेस विकल्प बनी।

आप सोच रहे होंगे यह आखिर संभव कैसे हुआ? बहुत आसान सा जवाब है। विकल्प के अभाव में, राजनीति के बदलते स्वरूप में, जाति-धर्म के इस स्नेह में सब संभव है। ऐसा इसलिए क्योंकि 2014 के बाद से सत्ता के हर समीकरण में पीछे चलने वाली कांग्रेस ने अब बीजेपी का फार्मूला अपना लिया है। राहुल ने मोदी की वह तमाम चलें समझ ली हैं। यही वजह है कि सिंधिया से लेकर पायलट तक युवाओं को मौका मिला। विरोध के स्वर एक राहुल नाम के आगे दब गए। कमलनाथ और गहलोत भी छा गए। खैर सब का साथ इस चुनाव में कांग्रेस के लिए काम कर गया।


बीजेपी के खिलाफ क्या गया? इस सवाल का जवाब भी बहुत आसान है? सोच समझ कर देखिए? जवाब है सालों की सत्ता के खिलाफ एन्टी इंकमबेंसी, मोदी की आरक्षण के खिलाफ नीति, स्वर्ण विरोधी नीति कहना ज्यादा जायज है। इसके अलावा किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारों की आशा और युवाओं का पलायन। उदाहरण के लिए व्यापम है, नक्सली बता कर हत्या करना एक कारण है। भामाशाह योजना की ऐसी तैसी होना वजह है। और भी न जाने कितनी वजहें हैं। उम्मीदों और आशाओं का पूरा न होना एक बड़ी वजह है। खैर यही भारत के लोकतंत्र की खूबी उर खामी ही। यही वजह रही कि राहुल गांधी आज बधाई के पात्र हैं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े नेता मोदी आज मात खा बैठे हैं। जीत हार परमपराओं में शुमार है लेकिन यह सबक जरूरी था।