भारत की राजधानी दिल्ली आज एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम की गवाह बनी। मौका भी था और दस्तूर भी, तैयारी भी थी और कमजोरी भी, इन सब के बीच उहापोह की स्थिति में फंसी बीजेपी ने आज आनन-फानन में एक बड़ा फैसला लिया जिसे 2019 के लोकसभा चुनाव से जोड़ कर देखा जाने लगा। यह फैसला था जम्मू और कश्मीर में सत्ता की भागीदारी छोड़ पीडीपी की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से अलग होने का। इस बेमेल गठबंधन के सफलता और असफलता का राग तो काफी समय से अलापा जा रहा था लेकिन इसका अंत ऐसे होगा इसकी उम्मीद शायद ही किसी दल, नेता या पत्रकार ने सोची होगी। इस गठबंधन को तोड़ने के पीछे कई मायने हैं। कुछ बड़े सवाल और जवाब भी हैं लेकिन इन सब के बीच इतना तो तय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपना वह मास्टरस्ट्रोक लगा दिया है जो उसके लिए सत्ता की चाभी पाने का सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है।

जम्मू और कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन को बेमेल शुरू से बताया जा रहा था। ऐसा इसलिए था क्योंकि दोनों दलों की न सिर्फ सोच बल्कि मुद्दे,एजेंडे,कार्यप्रणाली और बहुत कुछ अलग-अलग था और काफी बड़ा एक अंतर था जिसे पाटना शायद नामुमकिन था। आइये आपको बताएं कैसे? बीजेपी आपरेशन आल आउट की हिमायती थी जबकि पीडीपी इसे बंद करने की पैरोकारी में लगी थी। बीजेपी के शासन वाली केंद्र सरकार रमजान के बाद सीजफायर को खत्म करना चाहती थी जबकि महबूबा इसके खिलाफ थीं। पत्थरबाजों को शांति के माध्यम से कंट्रोल में करने की कवायद महबूबा चाहती थीं जबकि बीजेपी इन सब से अलग बल प्रयोग और सेना को छूट देने के मूड में थी। यही सब कारण टकराव की वजह बन बैठे और गठबंधन टूट गया।

अब बात राजनीतिक कारणों और 2019 कि करें तो बीजेपी ने कश्मीर में अपना समर्थन वापस लेकर अपना पहला ब्रह्मास्त्र तो चला ही दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर में आतंकी घटनाएं और सेना की जवानों की शहादत का मुद्दा देश की जनभावना से जुड़ा है। इसके अलावा धारा 370 और आर्टिकल 35 अ भी अहम मुद्दे हैं। ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग इन मामलों पर जस्टिस दीपक ठाकुर के रिटायर होने से पहले फैसला आ जाता है तो यह सोने पर सुहागा जैसा होगा वरना बीजेपी द्वारा आज लिया गया फैसला काफी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि राष्ट्रपति शासन के लगते ही सेना को खुली छूट होगी और राजनीतिक डर कम से कम छह महीने नही होगा। ऐसे में आतंकियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई संभव होगी। अब देखना है यह फैसला क्या गुल खिलाता है?