विपक्षी एकता को लेकर इन दिनों हर राज्य से आवाज़ बुलंद की जा रही है। कभी क्षेत्रीय राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे दल आज बीजेपी को हराने के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार दिख रहे हैं। आज दुश्मनों से गले लग राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने, जीतने और बीजेपी को हराने के दांव आज़माया जा रहा है। ऐसा होना लाजमी भी है क्योंकि अब विपक्ष भी शायद यह समझ चुका है कि किसी भी अलग-थलग पड़े दल के लिए बीजेपी को फिलहाल हराना मुश्किल है।

यही वजह है कि हाल के कुछ दिनों में कई धुर विरोधी नेता और दल हाथ मिलाते दिखे। हालांकि दलों के इस मिलन में दिल मिले या नही यह तो थोड़े वक़्त के बीतने पर ही पता चलेगा। विपक्षी एकता का सबसे बड़ा मंच और उदाहरण कर्नाटक और उत्तरप्रदेश बने। हालांकि इससे पहले बिहार बीजेपी विरोधी राजनीति के गठबंधन का गवाह रह चुका है लेकिन नीतीश के बीजेपी के साथ आने से यह गठबंधन फ्लॉप हो गया। अब एक बार फिर इस गठबंधन की सफलता को लेकर संदेह व्यक्त किया जा रहा है। यह हिट होगा या फ्लॉप? ऐसे सवाल सभी के मन मे उमड़ रहे हैं।

ऐसे में आइये जानें कि इस पेचीदे सवाल का जवाब क्या हो सकता है? इसका जवाब है कि यह गठबंधन सफल होता नही दिख रहा है। इसके पीछे दो वजहें हैं लेकिन उन दो वजहों से पहले ऐसे गठबंधन के इतिहास को देखें तो यह अब तक विफल रहा है। अब कारणों की बात करें तो विपक्षी एकता की राह में सबसे बड़ा रोड़ा नेतृत्व का आएगा। क्षेत्रीय दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को नेता मानने को तैयार नही, इसके अलावा अखिलेश,ममता, मायावती, मुलायम जैसे नेता भी नेतृत्व के दावेदार हैं ऐसे में एक नाम पर सहमति बनाना बड़ी चुनौती है। इसके बिना भी खास सफलता इसलिए नही मिल सकती क्योंकि बीजेपी के पास मोदी जैसा कद्दावर चेहरा है जो अकेले अपने दम पर हवा का रुख बदल सकते हैं। इसके अलावा दूसरी वजह से सीटों के बंटवारे में तालमेल। इसका सामंजस्य बिठाना भी विपक्षी एकता के लिए टेढ़ी खीर है। खैर बाकी समय आने पर ही इस एकता की हकीकत और अंजाम समझ आएगा।