यूपी को राजनीति का रिसर्च सेंटर कहा जाता है। कहा भी क्यों न जाये, यहां हर दिन कोई न कोई राजनीतिक घटनाक्रम, कोई न कोई समीकरण और कोई न कोई नया दल और नेता जो तैयार होता है। अभी कुछ महीनों के अंदर की ही बात करें तो कई चीजें तेजी से बदली हैं। पहली बीजेपी और राज्य में योगी के सहयोगी और सुहेलदेव पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर अपनी ही सरकार के खिलाफ हमलावर हैं। बीजेपी उन्हें बर्दास्त भी कर रही है। कारण अज्ञात है। दूसरा बुआ और भतीजा यानि मायावती और अखिलेश कुछ दिनों के लिए साथ आए। समीकरण भी बदले लेकिन अब दोनों की राहें अलग और भाषा तल्ख है।तीसरी यह कि जो कांग्रेस कभी गठबंधन और विपक्षी एकता की बात करती थी, वह मौन और गौण है। अखिलेश के चाचा शिवपाल अब अलग झंडे के साथ अलग सुर अलाप रहे है। इन सब के बीच हुई है राजा रघुराज प्रताप सिंह की राजनीति में धमाकेदार एंट्री।

इतने कारणों से आपने यह तो समझ लिया होगा कि यूपी की राजनीति में समीकरण बदलते देर नही लगते हैं। यही वजह है कि यह राज्य कभी बसपा ला गढ़ बना तो कभी बीजेपी और सपा का, यहां राजनीति कम या ज्यादा चली सबकी है। ऐसे में लखनऊ के रमाबाई मैदान में जिस तरह उम्मीद से ज्यादा भीड़ राजा भैया के लिए जुटी वह अपने आप मे बहुत कुछ कहती है। यह मान भी लें कि यह भीड़ बुलाई गई थी तो भी यह स्वीकार करने में कोई हिचक नही की पूरे देश मे न बस भेजी गई न अन्य सुविधाओं का लालच दिया गया। ऐसे में राजनीति के धुरंधर, छह बार से विधायक, राजा, बाहुबली और न जाने कितने उपनामों से जाने जाने वाले राजा भैया की यह छवि या उनके उठाये मुद्दों का ही जलवा है कि यह लखनऊ में आयोजित रैलियों में सबसे बड़ी में से एक है।

अब बात करते हैं कि इज़के बाद क्या? इसके बाद अब राजा भैया के लिए दो बातें ही हो सकती है। पहली यह कि राजनीति के फलक पर वह आने वाले समय मे जगमगाएंगे। दूसरी यह कि राजनीति में 25 सालों में जो भी जमा हुआ नाम और शोहरत है वह शायद फीकी पड़ जाए। इन दोनों बातों ले पीछे वजह है दलगत राजनीति और पहले से जमे क्षेत्रीय दलों का प्रभाव। 2019 की बात करें तो राजा भैया सबके लिए जरूरी हैं। शिवपाल के बाद अगर राजा भैया किसी दल के साथ जाते हैं तो समीकरण बदलेंगे यह तय है। आकलन और अब तक की राजनीति पर गौर करें तो राजा भैया और शिवपाल दोनो ही सपा-बसपा और कांग्रेस के साथ शायद ही जाएं। ऐसे में दो रास्ते हैं अकेला चलेंगे या बीजेपी के साथ जाएंगे। बीजेपी के लिए भी यह समय की मांग होगी और शायद यही समझौते की वजह बनें। खैर इन सब के बीच इतना तो साफ है राजनीति में राजा भैया और उनकी पार्टी जनसत्ता का नाम आने वाले समय मे गूँजेगा।