राजनीति में कब तक दोहराए जाएंगे पुराने राग, मुद्दे क्यों हैं गौण ?

राजनीति में बदलाव लाने के नाम पर आई आम आदमी पार्टी भी उसी दलगत,जातिगत राजनीति का हिस्सा बन गई है। भ्रष्टाचार और लंबे चौड़े वादे कर कांग्रेस को बेदखल करने वाली बीजेपी भी उसी राह चल चुकी है। कांग्रेस के पास न चेहरा है न देश के पास विकल्प जो इसकी भरपाई कर सके।

राजनीति भारत मे एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा सड़क से लेकर संसद और चाय की दुकान से लेकर घर की बैठक,ट्रेन और ऑफिस में हमेशा चलती है। यह बात अलग है कि ऐसी चर्चा कभी नतीजे पर नही पहुंचती। इसकी वजह दो है, पहली यह कि शायद हमें इससे अच्छा टाइमपास का साधन नही है। दूसरी यह कि शायद हम इज़के आदि हो चुके हैं। न हमें इसे बदलने में कोई दिलचस्पी है न समय है। साथ ही हम भी जाति,धर्म के बंधन वाले मोह और नेताओं के दिखाए,सुनाए लच्छेदार वादों और भाषणों में उलझ से गए हैं। इस उलझन की कोई डोर नही जिसे थाम कर बाहर निकलें। 

यही वजह है कि आज राजनीति में बदलाव लाने के नाम पर आई आम आदमी पार्टी भी उसी दलगत,जातिगत राजनीति का हिस्सा बन गई है। भ्रष्टाचार और लंबे चौड़े वादे कर कांग्रेस को बेदखल करने वाली बीजेपी भी उसी राह चल चुकी है। कांग्रेस के पास न चेहरा है न देश के पास विकल्प जो इसकी भरपाई कर सके। यह भी एक बड़ी वजह है कि हम झूठे वादों,आरोपों और पुराने मुद्दों से आगे बढ़ कर सोच नही पाते। कुछ सोच भी लें तो कर नही पाते। करने भी चलें तो यह तय नही होता कि इसका अंजाम और नतीजा क्या होगा?

इस बात को समझने का प्रयास करें तो बहुत स्पष्ट दिखता है कि आज तक कि जो राजनीति देश मे हुई है उसमें एक दूसरे के वादों,इरादों और मुद्दों को फ्लॉप दिखा खुद सत्ता हासिल करने के प्रयास हुए। जनता और विकास के मुद्दों से ज्यादा धर्म,जाति, गाय, गंगा जैसे मुद्दे छाए रहे। इसको अगर आज के राहुल गांधी के भाषण से जोड़ कर देखें तो यह बात और स्पष्ट होती है। आज राहुल ने अपनी एक रैली में कहा कि हमारी सरकार बनी तो हम किसानों का कर्ज माफ कराएंगे। माफ कीजिये सर लेकिन यह हालत क्यों हैं कि किसानों को कर्ज में डूबने की हालत बनी? उन्होंने कहा कि हम सत्ता में आये तो आपके हाथ मे मेड इन भोपाल मोबाइल होगा? बहुत अच्छी बात और वादे हैं लेकिन कैसे और अभी क्यों याद आये?

अब इसी पक्ष को आज मोदी की बनारस में हुई रैली से समझें तो लोग मोदी की रैली से बीच मे उठकर जाने लगे और अनुरोध के बावजूद नही रुके। ऐसे में इसे क्यों न ऐसे देखा जाए कि जनता अब झूठे वादों या लच्छेदार भाषणों से ऊब चुकी है और वह अब बस इसलिए किसी को बर्दाश्त कर रही है क्योंकि विकल्प का अभाव आड़े आ रहा है? आप भी सोचिए,राजनीति को चर्चा का नही बदलाव का विषय बनाइये। जागरूक बनें तभी शायद राजनेता फालतू के मुद्दों को छोड़ आपके हमारे मुद्दे उठाने को मजबूर होंगे।

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