केंद्र की मोदी सरकार यूँ तो अपने फैसलों को लेकर चर्चा में बनी ही रहती है और विपक्ष के निशाने पर रहती है। यह कोई बड़ी बात नही यही लोकतंत्र की खुसबसूरती भी है। लेकिन हाल के दिनों में एक वजह से मोदी सरकार इन दिनों एक खास वर्ग और अपने तथाकथित वोट बैंक के निशाने पर है। यह वोट बैंक है स्वर्ण समाज का जिसे बीजेपी का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है। इस विरोध का कारण है सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट में हुए बदलाव पर अध्यादेश लाकर उसे रद्द करना। यह अध्यादेश अब मोदी सरकार के लिए जी का जंजाल बनता नजर आ रहा है। यही वजह है कि अब सोशल मीडिया सहित राजनीतिक जानकारों के बीच इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या मोदी ने भी जल्दबाजी में कुछ ऐसा फैसला ले लिया और गलती कर दी जो वीपी सिंह और राजीव गांधी जैसे प्रधानमंत्री कर चुके थे?

आपको बताएं कि वीपी सिंह और राजीव गांधी ने ऐसी क्या गलती की थी, उससे पहले यह बताना आवश्यक है कि मोदी सरकार के अध्यादेश से एक बड़ा वर्ग गुस्से में है। न सिर्फ यूपी बिहार बल्कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर आवाज़ बुलंद करते हुए न सिर्फ बीजेपी का विरोध हो रहा है बल्कि 2019 के चुनावों में नोटा को विकल्प बनाने की बात भी जोर शोर से उठ रही है। स्वर्ण नेताओं का विरोध भी हो रहा है वहीं जो नेता अब भी चुप हैं उन्हें सबक सिखाने की बात भी लगातार हवा में तैर रही है। हो भी क्यों न? एससी/एसटी एक्ट के गलत प्रयोग का सबसे ज्यादा खामियाजा इसी वर्ग को भुगतना जो पड़ा है। इसके कई उदाहरण हैं। चाहे वह पटना में फंसे एक बड़े पत्रकार हों या नोएडा के रिटायर्ड कर्नल।

अब बात करते हैं वीपी सिंह द्वारा की गई सबसे बड़ी राजनीतिक भूल जो उनके राजनीतिक जीवन को चौपट कर बैठी। सभी यह जानते हैं कि आरक्षण को अमलीजामा वीपी सिंह ने पहुंचाया। वीपी सिंह उससे पहले तक स्वर्ण समाज के बड़े नेता थे। इज़के पीछे उनकी सोच यह थी कि आरक्षण का प्रावधान लाने से वह पिछड़े वर्ग के मसीहा के रूप में सामने आएंगे और इसका बड़ा राजनीतिक फायदा होगा। हालांकि हुआ इज़के उलट और उनके बोए आरक्षण रूपी पेड़ से उनके बाद के नेताओं को लाभ मिला और उनकी राजनीति लगभग समाप्त हो गई। इसके बाद ऐसी ही एक गलती राजीव गांधी ने दोहराई यह गलती थी शाहबानो केस में तीन तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये फैसले पर अध्यादेश लाना। उन्होंने भी इसे राजनीतिक फायदे के लिए किया लेकिन हुआ इसके उलट। खैर अब देखना है कि मोदी सरकार ने जो जल्दबाजी इस अध्यादेश को लाने में दिखाई है उसका अंजाम क्या होता है। हालांकि बड़े पैमाने पर विरोध होता देख यही कहा जा सकता है बात निकली है तो दूर तलक जाएगी….।