तमिलनाडु से कभी केंद्र चलाते थे करुणानिधि, निधन के बाद कौन होगा उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी?

दक्षिण भारतीय राजनीति के पितामह, तमिलनाडु के 5 बार के मुख्यमंत्री, 12 बार के विधायक और डीएमके पार्टी के अध्यक्ष एम करुणानिधि का आज शाम एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे और उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही थी। करुणानिधि के लिए ऊपर लिखे गए कुछ शब्द उनके लिए महज अलंकार हैं। इन शब्दों से और उपलब्धियों से कहीं ज्यादा बड़े थे करुणानिधि।

आज न सिर्फ तमिलनाडु की राजनीति में एक शून्यता आ गई बल्कि देश की राजनीति ने वह राजनेता खो दिया जिसने भारत की आज़ादी के बाद से लेकर आज तक लोकतंत्र के कई स्वरूपों को देखा, जिया और अपना योगदान दिया। तमिलनाडु सहित भारत भर में आज शोक की लहर है। पीएम से लेकर देश के तमाम क्षेत्रों के हस्तियों ने करुणानिधि के निधन पर शोक जाहिर किया है। उनके बीमार होने की खबर आने के बाद सदमा लगने से 20 से ऊपर जानें चली गई। ऐसे में उनके निधन के बाद तमिलनाडु में शोक की लहर है। खामोसी है।

करुणानिधि के बारे में बात करें तो उनके व्यक्तित्व के पहचान के दो आधार थे। पहला उनका पीला शॉल और दूसरा काला चश्मा। काफी समय से वह व्हील चेयर पर थे। हालांकि यह उनकी जीवटता और राजनीति से उनका लगाव ही था कि 28 जुलाई को अस्पताल में भर्ती होने से कुछ समय पहले तक वह राजनीति में सक्रिय रहे।

तमिलनाडु की राजनीति में यह दूसरा मौका है जब एक राजनीतिक शून्यता नजर आ रही है। दूसरा इसलिए क्योंकि अभी कुछ एक साल पहले ही जयललिता जैसी बड़ी राजनीतिक हस्ती का निधन हुआ था।करुणानिधि और जयललिता की छवि या उनकी बराबरी का कोई भी नेता फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में नजर नही आता। ऐसे में दक्षिण की द्रविड़ राजनीति को लेकर भी एक नया सियासी संकट देखने को मिल सकता है।

करुणानिधि के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो वह पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। 12 बार यानि अपने जीवनकाल के 60 साल तक वह एक जनप्रतिनिधि रहे। वह हमेशा जीतते रहे। पार्टी में उतार चढ़ाव आये लेकिन अगर कुछ नही बदला तो करुणानिधि का द्रविड़ और तमिलनाडु की राजनीति में उनका रुतबा। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि राजनीति में उनका नाम कितना बड़ा था। राजनीति के इतिहास की बात करें तो करुणानिधि 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से लेकर अब तक के हर उतार चढ़ाव के साक्षी रहे।

एक राज्य की राजनीति से आने वाले करुणानिधि का दखल उतना ही केंद्रीय राजनीति में भी रहा। 10 साल की मनमोहन सरकार में उनके नेतृत्व में डीएमके भागीदार रहा। ए राजा और उनकी बेटी कनिमोझी पर 2जी घोटाले का बदनुमा दाग भी लगा लेकिन इससे न करुणानिधि की राजनीति और न डीएमके पर कोई फर्क आया। वह सत्ता में अहम सहयोगी और भागीदार रहे।

ऐसे में अब उनके बाद एक बड़ा सवाल यह है कि अब उनकी राजनीतिक विरासत किसके हाथ जाएगी? बेटे स्टालिन या बेटी कनिमोझी? स्टालिन बेशक करुणानिधि के रहते राजनीतिक अगुवा रहे लेकिन कनिमोझी केंद्र की राजनीति में सक्रिय रही हैं। उनपर 2जी घोटाले का आरोप भी लगा। ऐसे में भविष्य जो भी हो लेकिन करुणानिधि के निधन से न सिर्फ तमिलनाडु बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का एक अनुभवी और बड़ा नेता आज हमेशा के लिए खामोश हो गया। इस दुख की घड़ी में भगवान उनके समर्थकों और परिवार को धीरज दे, इसे सहने की क्षमता दे। 

Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments