2019 के चुनावों में अभी काफी वक्त बाकी है। एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों और योजनाओं की उपलब्धियों को गिनाने के साथ हर कील को दुरुस्त करने में लगी है। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष एकजुट होने की बात कर मोदी सरकार की विफलता का राग अलाप रहा है। एनडीए में भी बगावती तेवरों के बीच मान-मनौवल का दौर जारी है।

इन सभी खबरों का निष्कर्ष यह है कि अब जब तक चुनाव हो नही जाते तब तक राजनीति का हाइवोल्टेज ड्रामा पूरे देश मे देखने को मिलेगा। इसके अलावा आकलन, अनुमान, आरोप-प्रत्यारोप, सफलता और विफलता बताने और गिनाने का सिलसिला भी जारी रहेगा। इन सभी चीजों के बीच एक बात बीजेपी और एनडीए में पक्ष में जाति दिखाई दे रही है। वह है पीएम मोदी का चेहरा और यही बात तथाकथित रूप से एकजुट विपक्ष के खिलाफ नजर आ रही है।

विपक्ष की तरफ से बेशक कांग्रेस अपने आप को अगुवा मां रही है लेकिन इसमें कई पेंच हैं। इनमे सबसे पहला पेंच है राहुल गांधी। यह इसलिए क्योंकि ममता बनर्जी सहित कई नेता राहुल के नेतृत्व को शायद ही स्वीकार करें। इज़के अलावा गठबंधन और सीटों का बंटवारा भी एक बड़ा विवाद का कारण बन सकता है। सीटों का बंटवारा अहम इसलिए है क्योंकि यूपी में सबसे ज्यादा सीटें हैं वहां सपा और बसपा अगर कांग्रेस की सहयोगी बनीं तो यह तय है कि कांग्रेस को सबसे कम सीटें मिलेंगी। इसके अलावा यही हाल बंगाल में होगा क्योंकि ममता ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगी।

कमोबेश यह स्थिति कांग्रेस के लिए पूरे देश मे बनेगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए इसमे समझौता करना थोड़ा मुश्किल होगा। हालांकि कर्नाटक में बीजेपी को रोकने के लिए जिस तरह कांग्रेस ने कुमारस्वामी के लिए कुर्बानी दी अगर वैसा कुछ हो तो यह मामला निपट सकता है। 

अब बात करते हैं उस आखिरी दांव की जो विपक्ष अपनी एकजुटता चुनाव तक बचाये रखने के लिए कम से कम चल सकता है। यह दांव है बिना पीएम उम्मीदवार या चेहरे के चुनाव लड़ना। उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो हाल ही में दिल्ली पहुंची ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद यह सामने आया है कि विपक्ष चुनाव बिना किसी चेहरे पर लड़ेगा।

बाद में सीटों की स्थिति के आधार पर सर्वसम्मति से नेता चुना जायेगा। इन खबरों में दम इसलिए नजर आता है क्योंकि विपक्ष एकजुटता में भले एनडीए में शामिल दलों से मजबूत हो लेकिन ऐसा कोई चेहरा फिलहाल नही है जो पीएम मोदी की बराबरी कर सके। खैर देखना है यह दांव विपक्ष को कब तक एकजुट रख पाता है और बीजेपी के खिलाफ कितना कारगर साबित होता है।