भारत

क्या मजबूर और कमजोर हो गया है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, सबूत है यह खबर

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने का दर्जा और गौरव प्राप्त है। इस देश मे कहने को बहुत आज़ादी है। हमारे संविधान में भी इससे संबंधित उल्लेख हैं। हम जब चाहें, जो चाहें बोल सकते हैं। हालांकि एक वक्त ऐसा था जब बोलने पर पाबंदी लगी थी। यह वक़्त था आपातकाल का। तब इंदिरा गांधी की सरकार थी। वह घोषित था। मीडिया पर, नेताओं पर और पत्रकारों पर सेंसरशिप थी। हालांकि अब वह वक़्त नही है। मुद्दे बदल गए हैं और मायने भी बदल चुके हैं। इन सब के बावजूद कुछ बातें ऐसी हैं जो खटकती हैं कि क्या वाकई मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसे पूरी आजादी है? क्या पत्रकार स्वतंत्र हैं? इस सवाल का जवाब व्यक्ति दर व्यक्ति या मीडिया हाउस के हिसाब से बदल सकता है लेकिन आज के इस आधुनिक युग की मीडिया यानि सोशल मीडिया की मानें तो यकीन मानिए इस सवाल का जवाब है, नही।

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आइये आपको बताएं क्यों?पत्रकारिता में पुण्य प्रसून वाजपेयी एक बड़ा नाम हैं। उनकी कई किताबें आज यूनिवर्सिटी में सिलेबस के रूप में पढ़ाई जाती हैं। उनके कार्यक्रम किसी भी चैनल पर आये वह हिट हुए। अब वह चर्चा में हैं लेकिन अफसोस इस बार किसी कार्यक्रम या शो या किताब या इंटरव्यू की वजह से नही बल्कि उस महान लोकतंत्र की वजह से जिसने उन्हें बाध्य कर दिया है। तथाकथित रूप से यह चैनल का या उनका निजी मामला हो सकता है लेकिन यह कहीं से पर्दे में नही की आज तक मे रहते हुए उन्हें बाबा रामदेव से तीखे सवाल पूछना महंगा पड़ा वहीं एबीपी न्यूज़ में उनके कार्यक्रम मास्टरस्ट्रोक को लेकर तमाम विवाद हुए। इन विवादों के बीच केंद्र सरकार के एक मंत्री ने यहां तक कह दिया था कि मोदी सरकार के खिलाफ जानबूझकर एजेंडा तय किया जा रहा है।

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खैर पुण्य प्रसून वाजपेयी इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि वह एक बड़ा नाम हैं। एक अनुभवी और वरिष्ठ पत्रकार हैं। वरना न जाने कितने इस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सिपाही ऐसे ही रोज धकियाये जाते हैं। उनकी न कोई सुनवाई है न कोई आवाज़ उठाने वाला। क्योंकि चैनलों की फंडिंग से बढ़कर ईमानदारी नही है साहब। हमनें खुद पत्रकारिता के लंबे करियर में कई ऐसे मामले देखे जब एक छोटे से चैनल के ऊपरी लेवल पर डील फिक्स कर यह तय किया गया कि क्या खबरें किनके खिलाफ चलेंगी या नही। यह आज भी अनवरत जारी है। हालांकि यह सब चैनल पालिसी हो सकती है लेकिन इस पालिसी की आड़ में पत्रकारिता को नीलाम तो मत करो। एक लेख से संबंधित एक दिलचस्प वाक्या हुआ जब एक पहले के सांसद और मंत्री जी ने बुलाकर कहा कि अपनी बिरादरी के हो इतना तो ख्याल रखो। खैर वाजपेयी जी झुके नही, अटूट रहे यह उनका बड़कपन है, उनके वसूल और आदर्श हैं। बाकी मेरा भारत महान। आप भी दें इस खबर पर आप अपनी राय और बताएं कि क्या मानते हैं आप?

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Vijay Rai
Human by Birth,Hindu by Religion,Indian by Nationality,Politics is my choice,journalism-my passion.

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