क्या ममता के लिए समाज और देश से बड़ी है राजनीति, कहाँ तक जाएगा यह स्तर ?

ममता राजनीति के लिए किस स्तर तक जाएंगी? क्या उनके लिए केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों तक कि कोई अहमियत नही है? बंगाल में साम्प्रदायिक हिंसा की भयावहता दुनिया देख चुकी है।

असम के लिए आज का दिन न सिर्फ ऐतिहासिक रहा बल्कि कई मायनों में विवादित भी रहा। आज जो हुआ उसका अंदेशा पहले से ही जताया जा रहा था। इसके अलावा यह भी कयास लगाए जा रहे थे कि इज़के बाद राजनीतिक बवाल भी उठना तय है। दरअसल यह सब बातें नेशनल सिटीजन रजिस्टर के आंकड़े सामने आने के बाद कि बातें हैं। एनआरसी के इन आंकड़ों के सामने आने के बाद यह लगभग तय हो गया है कि भारत के असम में अवैध रूप से रह रहे लगभग 40 लाख लोगों को देश छोड़ना पड़ सकता है।

इन आंकड़ों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक और पीएम मोदी के वादे से जोड़ कर देखा जा रहा है। आपको यहां सबसे पहले यह बता दें कि यह अवैध घुसपैठिये असम सहित पूर्वोत्तर के लिए बड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का कारण माने जाते रहे हैं। वहां से इनको बाहर निकालने की मांग भी काफी पुरानी है लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने आज तक इस पर कोई कार्रवाई नही होने दी थी।

इस कार्रवाई के दौरान अवैध रूप से रह रहे 3.29 करोड़ लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने का पूरा वक़्त दिया गया। इस दौरान छह करोड़ कागज़ात भी सरकार के पास जमा कराए गए। हालांकि इन सब के बावजूद 40 लाख लोग अवैध नागरिक पाए गए। जिन्हें अब भारत छोड़ना होगा। अब इसी को लेकर राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ है। इसकी अगुवा बनी हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।

ममता ने इन आंकड़ों के सामने आने के बाद कहा कि यह बीजेपी ने वोट पाने के लिए किया है। उनके निशाने पर बंगाल और बिहार के लोग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यहां से निष्काषित लोग कहाँ जाएंगे? पुनर्वास का क्या कोई कार्यक्रम तय है। साथ ही उन्होंने अतिउत्साह में यह ऐलान भी कर दिया कि हम देखेंगे कि ऐसे लोगों की मदद कैसे की जा सकती है। हमारे सांसद असम के दौरे पर हैं और आगे मैं खुद भी जाऊंगी।

ममता के प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी अपने एक बयान में कहा कि यह रिपोर्ट निष्पक्ष है और बेवजह कुछ लोग डर फैला रहे हैं। वहीं बीजेपी के फायरब्रांड नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि भारत से तुरंत अवैध नागरिकों को निकाल जाए। यह कोई धर्मशाला नही है। खैर यह तो कुछ अहम बयान थे जो इस मुद्दे पर आए।

अब सवाल है कि ममता राजनीति के लिए किस स्तर तक जाएंगी? क्या उनके लिए केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों तक कि कोई अहमियत नही है? बंगाल में साम्प्रदायिक हिंसा की भयावहता दुनिया देख चुकी है। उनपर कई बड़े आरोप लगते रहे हैं ऐसे में यह क्यों न माना जाए कि ममता का यह बयान किसी सम्प्रदाय विशेष को लुभाने के स्टंट है?

ममता पर तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप लगते रहे हैं ऐसे में अगर बंगाल में 40 लाख लोग जिन्हें केंद्र और सुप्रीम कोर्ट भी अवैध नागरिक और घुसपैठी मानता है वह बंगाल में जाकर क्या गुल खिलाएंगे? क्या असम जैसी समस्या बंगाल में नही होगी? कुल मिलाकर सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब शायद यही है कि क्या ममता के लिए समाज और देश से बढ़कर कहीं न कहीं राजनीति है?

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