देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों की बदहाली की खबर से आप और हम हर दिन दो चार होते हैं। यह खबरें कभी-कभी हृदय विदारक होती हैं। बात कर्ज से दबे किसानों के आत्महत्या की हो या अपने हक की लड़ाई के लिए मल-मूत्र का सेवन करने की, ऐसी घटनाओं ने सभी को अंदर तक झकझोर दिया। कभी किसान मजबूरी में चुपचाप मौत को गले लगा रहे हैं तो कभी अपने हक के लिए उन्हें कुछ ऐसा करना पड़ता है जो शर्मनाक है लेकिन शायद इसके अलावा उन्हें लगता है कि कोई अन्य विकल्प नही है। हद तो यह है कि इसके बावजूद सरकार के किसी प्रतिनिधि के पास इतना समय नही की इनकी बात सुन सके। ऐसे में सवाल है कि सरकारें किसके साथ और किसके विकास की बात कर रही हैं?


बात भारत के किसी सुदूर राज्य के किसी छोटे कस्बे या गांव की होती तो भी यह समझ मे आता कि चलो दूर है वहां मीडिया और सरकार के नुमाइंदों नही पहुंच सकते लेकिन जब देश की राजधानी दिल्ली में तमिलनाडु से आकर किसान 41 दिन तक धरने पर बैठें और कोई न सुने तो यह दुर्भाग्य ही है। उनकी मांग भी कोई बहुत बड़ी नही थी, बस ऋण माफी और पटवन के लिए उचित पानी की मांग कर रहे थे। लेकिन बड़े वादे करने वाले राजनेता और चुनाव के समय ऋण माफी की बात करने वाली सरकारों के पास न वक़्त था न कुछ नीति। ऐसे में किसानों ने विरोध के लिए मानवता को शर्मसार करने वाला तरीका अपनाया। अपने ही मल-मूत्र का सेवन किया, क्या यही भारत मे बाकी राह गया था। जिस भारत की पहचान किसान और गांव से है वही बदहाल है तो कैसे बने न्यू इंडिया और क्यों बने न्यू इंडिया?

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