पाकिस्तान में चुनावी सरगर्मियां तेज हैं। हर तरफ राजनीतिक रंग चढ़ा हुआ है। आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर जारी है। इस चुनाव में पूरी दुनिया की दिलचस्पी है। हो भी क्यों न, आतंकवाद के नाम से अपनी पहचान रखने वाले देश मे आतंक का आका हाफिज सईद ताल ठोक रहा।

दूसरी तरफ पाक की राजनीति के बड़े और अनुभवी खिलाड़ी नवाज जेल में हैं। इमरान खान पर खुद उनकी पत्नी ने बड़े और गंभीर आरोप लगाए हैं। ऐसे में राजनीति दिलचस्प और विवादित न हो तो क्या हो? साथ ही इज़के पीछे एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान में हो रहे यह चुनाव भारत सहित दुनिया के लिए काफी मायने रखते हैं।

आतंकवाद के मुद्दे पर इन चुनावों का गहरा असर पड़ेगा यह सभी जानते हैं। हालांकि इन सब के बीच इस चुनाव में जो खास बात सामने निकल कर आ रही है वह यह है कि भारत और पाक के बीच आज़ादी के बाद से ही विवादों की वजह कश्मीर मुद्दा इस बार गौण है।

पाकिस्तान में कश्मीर का मुद्दा किसी भी दल की प्राथमिकता नही है। हो भी क्यों? आज तक न इसका कोई निदान निकला न ही भारत पाक इस मुद्दे पर कभी एक कदम भी आगे बढ़ सके। नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

यहां तक कि जैसे जैसे स्थिति बिगड़ी पाकिस्तान दुनिया की नजरों में बदनाम ही हुआ। ऐसे में जनता और आम आवाम का भरोसा इस मुद्दे को लेकर सरकार पर नही के बराबर है। हालांकि भारत की चर्चा इसके बावजूद भी है।

पाकिस्तान के चुनाव में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दुनिया के मंचों पर भारत की बढ़ती ताकत को पाक का हर आम और खास नेता आज मानने को मजबूर है। भले ही यह मजबूरी है लेकिन जरूरी है। यही वजह है कि नवाज शरीफ के भाई शहबाज़ शरीफ ने अपने हालिया बयान में कहा कि भारत और मोदी से आगे पाकिस्तान को लेकर न गया तो नाम बदल देना। इससे पहले भी शहबाज़ पीएम मोदी के जी-20 मंच को लेकर बयान दे चुके हैं।

शहबाज़ के अलावा पूर्व क्रिकेटर और नेता इमरान खान भी यह मान चुके हैं कि भारत की स्थिति पाकिस्तान से बेहतर है और दुनिया की नजरों में उनका अलग सम्मान है।


ऐसे में पाकिस्तान के चुनावों से कश्मीर मुद्दे के गायब होने और मोदी नाम का स्मरण भले ही वहां नेताओं का चुनावी स्टंट हो सकता है लेकिन अब सवाल यह भी है कि क्या 2019 में जब भारत मे चुनाव होंगे तो भारत मे भी यही स्थिति होगी। कहने का मतलब क्या मोदी लहर फिर भारत मे चलेगी और 2014 का परिणाम 2019 में दोहराया जाएगा? क्या भारत के चुनावों में कश्मीर और पाकिस्तान का मुद्दा होगा या पाक की तरह यहां भी नगण्य होगा?

क्या पाकिस्तान की बदलती राजनीति और समीकरण के बीच बचे समय मे रिश्ते बेहतर बनेंगे? ऐसे ही न जाने कितने और सवाल एक ही दिन आज़ाद हुए इन दो मुल्कों के लोगों के मन मे हैं। खैर जवाब आने वाले वक्त के पास ही है।