बिहार राजनीति का केंद्र सदियों और कई दशकों से समझा और माना जाता है। इसे राजनीति का रिसर्च सेन्टर भी कहा जाता है, इसके पीछे की वजह यह है कि यहां राजनीति में जितने प्रयोग हुए उतने शायद ही अन्य किसी राज्य में हुए होंगे।

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से लेकर अब तक कि ही बात करें तो कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिले। पहले नीतीश बीजेपी से अलग हुए, फिर कांग्रेस और राजद के साथ गए, इसके बाद चुनाव जीता सीएम बने और फिर गठबंधन तोड़ा, इसके बाद बीजेपी से मिले और सरकार बनाई लेकिन अब फिर कहीं न कहीं कुछ खटपट है ऐसा लग रहा है?


बिहार की राजनीति हर दिन कोई नया करवट लेती नजर आ रही है। कभी गठबंधन की मजबूरी तो कभी मोदी, नीतिश जरूरी के तर्ज पर काम चल रहा था। लेकिन नीतीश ने अचानक एक गेम खेला और इसमें माहिर नीतीश का यह दांव काम कर गया, ऐसा फिलहाल प्रतीत होता है। नीतीश यही चाहते हैं कि 2019 से पहले ही यह तय हो जाये कि कौन कितनी सीट पर चुनाव लड़ेगा और किसकी क्या सहभागिता होगी?

बीजेपी यह कतई नही चाहती? खैर इसमे कभी हां कभी ना कि राजनीति में अब नीतीश धमकी देने के अंदाज़ में नजर आ रहे हैं।

अब आज की ही बात करें तो नीतीश ने लालू यादव को फ़ोन घुमा दिया। इसके बाद राजनीतिक गलियारे में हलचल मच गई। हो भी क्यों न? दो दुश्मन बात जो कर बैठे? तेजप्रताप की शादी को छोड़ यह पहला मौका था जब महागठबंधन से अलग होने के बाद नीतीश और लालू की बात हुई। यह शिष्टाचार बात हो सकती है लेकिन इसके अपने मायने हैं।

नीतीश रिस्क लेना नही चाहते, बीजेपी नीतीश को मौका नही देना चाहती और राजनीति में फिलहाल अपरिपक्व तेजस्वी के वश में फिलहाल कुछ नही है। 

आज की ही बात करें तो तेजस्वी जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नीतीश के साथ जाने के किसी भी सवाल से इनकार कर रहे थे वहीं नीतीश ने मुम्बई के एशियन हार्ट हॉस्पिटल में भर्ती लालू यादव को फ़ोन कर राजनीति में नई संभावनाओं को जन्म दे दिया।

यह बेशक शिष्टाचार या किसी अन्य मकसद से की गई बात हो सकती है या यूं कहें नीतीश की दबाव राजनीति का हिस्सा हो सकता है लेकिन इतना सच है कि इनकी चर्चा गंभीर स्तर पर होनी शुरू हो गई है। इसके अलावा इसमें कोई संदेह नही की बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिलें?