भारत मे कई ऐसे नेता हुए जो किसी न किसी अंदाज और वजह से आम लोगों के मस्तिष्क पटल पर हमेशा के लिए अमिट छाप छोड़ गए। वर्तमान राजनीति में भी कई ऐसे हैं तो कई ऐसे इस दुनिया से विदा हो गए। कोई सादगी की प्रतिमूर्ति बन इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गया तो कोई कविता और ओजस्वी भाषणों की वजह से याद रह गया, कोई अपनी सरकार के कामकाज की वजह से अपना नाम कर गया तो कोई घोटाले और अन्य कारणों से बदनाम हो गया। इसी क्रम में आज एक ऐसा नाम भी है जो बदनाम तो हुआ लेकिन उसका नाम आज भी ऐसा है कि राज्य से लेकर केंद्र तक उसकी चर्चा होती है।

जी हां हम बात कर रहे हैं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव की, एक ऐसा नेता जो राज्य से लेकर केंद्र तक कई पदों पर रहे। छात्र नेता के रूप में अपने जीवन की शुरुआत करने वाले लालू के गंवई अंदाज़ की बात ही निराली है। उनके चुटीले भाषणों से गंभीर संदेश और बात कहने की कला का कोई तोड़ नही है। उनके कद का कोई सानी नही है। लालू के बारे में एक और खास बात है कि वह अगर किसी पर खुश होते तो उसे मंत्री, विधायक बनाते देर न करते। 

लालू गरीबों, पिछड़ों के नेता माने जाते हैं। उनकी राजनीतिक सोच और वर्ग तय है। वह इसे लेकर स्पष्ट रहे और आजीवन कहते रहे कि ‘माय’ समीकरण के भरोसे ही उनकी राजनीति रही। हालांकि चारा घोटाला उनके जीवन का एक ऐसा बदनुमा धब्बा बना जिसने उन्हें आज उम्र के इस पड़ाव में जेल में जीवन बिताने को बाध्य कर दिया। इसके बावजूद न लालू झुके, न बदला उनका तेवर और अंदाज़। इसलिए तो कहते हैं कि लालू बदनाम तो हुए लेकिन नाम भी खूब हुआ।