पश्चिम बंगाल इन दिनों तनाव के बुरे दौर से गुजर रहा है। सरकार जान बूझ कर अनजान बनी हुई है। पुलिस प्रशासन निष्क्रिय है। जनता जाति और धर्म के नाम पर आपसी कलह में उलझी है। शीर्ष नेता और दल अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि रामनवमी से शुरू हुआ हिंसा का दौर अब तक बदस्तूर जारी है।

कहा तो जा रहा है कि यह टीएमसी और बीजेपी के कार्यकर्ताओं के बीच राजनीतिक झड़प है लेकिन अगर सही मायनों में देखें तो यह गलत राजनीति की परंपरा की एक शुरुआत है। यह वह परंपरा है जहां सत्ता के लिए समाज के टुकड़े करने की एक साजिश की बू आ रही है। बीजेपी वहां शून्य से शिखर पर आने को आतुर है वहीं वाम के लाल किले को बंगाल में ध्वस्त कर सत्ता में काबिज हुईं ममता को अपने ऊपर कुछ ज्यादा ही यकीन हो चला है।

बंगाल में राजनीति मुद्दों से ज्यादा धर्म पर आधारित हो चली है। कभी ममता पर बीजेपी तो कभी बीजेपी पर ममता इसी मुद्दे को लेकर हमलावर राह रहे हैं। यह सही भी है क्योंकि जिस तरह रानीगंज में पहले हिंसा हुई और उसके बाद जिस तरह हालात बेकाबू हुए वह इसी तरफ इशारा करते हैं। ममता यहां सीधे तौर पर इसलिए भी जिम्मेदार हैं क्योंकि वह राज्य की मुखिया है। इस मायने में उदाहरण स्वरूप बिहार को लें तो साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश सरकार की सक्रियता से टाली गई लेकिन बंगाल में उल्टे इसे बढ़ाया गया और यह लगातार जारी है। ऐसे में तुष्टिकरण की इस राजनीति में यह कहना गलत नही होगा कि ममता खुद बीजेपी के लिए आगे की राह आसान कर रही हैं।