देश मे इन दिनों अजीब माहौल है। असली मुद्दे गौण हैं और ऐसे मुद्दे चर्चा में हैं जो समझ से ही परे हैं। कहीं जातीय उन्माद है, कहीं धार्मिक उन्माद है तो कहीं आरक्षण के विरोध और समर्थन में हल्ला बोल है। विकास, शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली, महंगाई, जीडीपी इत्यादि मुद्दों से न अब सरकार का कोई सरोकार दिख रहा है न विपक्ष इसमे रुचि ले रहा है।

सब की अपनी डफ़ली अपना राग है। ताज्जुब की बात यह है कि डिजिटल मीडिया के दौर में तथाकथित जागरूक जनता भी इसी भूलभुलैया में उलझी है। हालांकि इन सब के बीच एक ऐसा ही मुद्दा है जिसने बीजेपी के साथ निजी तौर पर शाह और मोदी की भी टेंशन बढ़ा दी है। इसके अलावा इसी मुद्दे पर विपक्ष खुश नजर आ रहा है।

2 अप्रैल को भारत बंद का एलान किया गया था। यह बंद एससी/एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध में था। यह बंद सफल या असफल रहा, इसके अपने अपने दावे हैं लेकिन यह हिंसक और देश को कलंकित कर गया इसमे कोई संदेह नही है। इस हिंसा की भेंट 14 राज्य चढ़े। दिलचस्प यह है कि विपक्ष इसे सरकार के खिलाफ मुद्दा बना और बंद को समर्थन दे अपनी पीठ महज इसलिए थपथपा रहा है क्योंकि भीड़ जुटी और हर राज्य में इसका असर दिखा। सरकार की नजर में यह साजिश है। हालांकि यही सबसे बड़ी टेंशन भी है।

ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार यह मान कर चल रही है कि विपक्ष इसे आरक्षण से जोड़ लोगों को सरकार के खिलाफ करने में सफल रहा है और लोग जागरूकता के अभाव में इसे सच मान बैठे हैं। सच भी यही है क्योंकि बंद के दौरान इसमे शामिल अधिकतर लोगों को असल मुद्दा पता ही नही था।

कार्यकर्ता छोड़िये अगुवाई कर रहे नेता ही आरक्षण से इसे जोड़ रहे थे। इस आदेश को समझ ही नही पाए। ऐसे में दलित वर्ग आज सरकार के खिलाफ है। अब डैमेज कंट्रोल में बीजेपी जुटी है। हालांकि यह देखना शेष है कि बीजेपी के लिए यह मुद्दा कितना नुकसानदेह और विपक्ष के लिए कितना फायदेमंद होगा?