इस समाज मे सभी समझदार तो दंगों और तनाव के लिए कौन जिम्मेदार, पढ़ें

एक साथ समाज के दुश्मनों को जवाब देने की जरूरत है, न कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर ज्ञान की बात कह उस दंगाई भीड़ में शामिल होने की जिसका न कोई मकसद है न उद्देश्य वह महज एक धर्म,दल और व्यक्ति की चरण वंदना में समाज का दुश्मन बन बैठा है। सोचिएगा जरूर, बचा लो अपनो संस्कृति और समाज।

पश्चिम बंगाल से लेकर बिहार तक इन दिनों कुछ अच्छा नही चल रहा है। दोनो ही राज्य बुरी खबरों को लेकर सुर्खियों में हैं। धार्मिक उन्माद तेजी से फैल रहा है और सरकारें अब तक इनसे निपटने में विफल ही नजर आ रही हैं। शुरुआत दोनो ही जगह रामनवमी से हुई और यह सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि थमने का नाम नही ले रहा है। इन सब के बीच राजनीति का दौर जारी है, आरोप-प्रत्यारोप के बीच नफा नुकसान का आकलन किया जा रहा है। इन सबसे निपटने के नाम पर मीडिया में बयान बाजी भी खूब हो रही है।

ऐसे में सोशल मीडिया भी अपना काम बखूबी कर रहा है। कहीं दल और धर्म भक्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है तो कहीं उन्माद बढ़ाया जा रहा है। हालांकि ऐसे लोगों की भी कोई कमी नही है जो इन सब के खिलाफ हैं और शांति और सदभाव का पाठ पढ़ा रहे हैं।

इन सब के बीच आज एक दिल को छू लेने वाला बयान उस पिता की तरफ से आया जिसने इस हुड़दंग और उन्माद की आग में अपने 16 वर्षीय बेटे को खो दिया। हम बात कर रहे हैं आसनसोल के उस इमाम की जिनका बेटा इन दंगों की बली चढ़ गया। उस पिता के दिल पर क्या बीत रही होगी अगर इन सब से फुरसत मिले तो सोचिएगा। अपने बेटे को खोने के बावजूद वह कहते हैं कि इसे मुद्दा न बनाये, नफरत न फैलाएं, इस्लाम अमन और शांति का पैगाम देता है। मैंने अपना पूरा जीवन यही बताते हुए समर्पित कर दिया। हालांकि दिल मे एक टीस भी है कि इस शहर को क्या हो गया? कल तक एक अपनापन था, प्यार था, सौहार्द था उसे किसकी नजर लग गई?

इससे पहले दिल्ली में अंकित हत्याकांड के बाद भी उनके पिता ने भी ऐसा ही बयान दे शांति की अपील की थी। लोग फेसबुक, ट्विटर के माध्यम से भी खूब ऐसी बातें लिख रहे हैं। अब इन बातों के बीच एक कड़वा सवाल यह है कि अगर सब इतने ही समझदार हैं तो इन दंगों के लिए कौन जिम्मेदार है?

इस मुश्किल से दिखने वाले सवाल का जवाब बहुत आसान है। इसका जवाब है यह वही लोग हैं जिन्हें इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर फायदा है। सीधे-सीधे हम राजनीति की गंदी चाल को भी इसका जिम्मेदार कह सकते हैं। इसके अलावा फेसबुक पर बढ़ती नजदीकी और समाज मे बढ़ती दूरी भी एक कारण है। हम आधुनिक हुए लेकिन हमारी सोच का दायरा सिमट सा गया है। आज हम खुद अपने दुश्मन बन बैठे हैं। यही वजह है कि आज झंडा लगा हमें अपनी पहचान और धर्म बतानी पड़ रही है, यही वजह है कि एक गाने की वजह से हमारी भावना आहत होने लग जाती है।

ऐसे में इन सब से निकलने की जरूरत है। एक साथ समाज के दुश्मनों को जवाब देने की जरूरत है, न कि फेसबुक और सोशल मीडिया पर ज्ञान की बात कह उस दंगाई भीड़ में शामिल होने की जिसका न कोई मकसद है न उद्देश्य वह महज एक धर्म,दल और व्यक्ति की चरण वंदना में समाज का दुश्मन बन बैठा है। सोचिएगा जरूर, बचा लो अपनो संस्कृति और समाज।

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