जब माणिक और मनमोहन की सरकार नही बची, तो कुछ भी सम्भव

राजनीति में एक व्यक्ति की ईमानदारी से फर्क नही पड़ता लेकिन एक व्यक्ति की बेईमानी का खामियाजा पूरे दल को भुगतना पड़ता है। इसके दो उदाहरण हैं।

राजनीति में एक व्यक्ति की ईमानदारी से फर्क नही पड़ता लेकिन एक व्यक्ति की बेईमानी का खामियाजा पूरे दल को भुगतना पड़ता है। इसके दो उदाहरण हैं। पहला उदाहरण है हाल के दिनों में आये त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के नतीजे जिसमे देश के सबसे ईमानदार और गरीब माने जाने वाले सीएम माणिक सरकार सत्ता गंवा बैठे। दूसरा उदाहरण केंद्र की पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार का है। इस सरकार के दौरान पीएम बेदाग रहे लेकिन मंत्रियों की कारस्तानी ले डूबी।


ऐसे में एक सवाल उठता है कि क्या एक आदमी के बेईमान होने से या घोटालेबाज होने से पूरी पार्टी दोषी है? अगर ऐसा है तो फिर इसकी ईमानदारी के लिए भी यही पैमाना होना चाहिए। आज मोदी सरकार बेशक पाक साफ है लेकिन इसके बावजूद सरकार पर पीएनबी घोटाले का दाग तो लग ही गया है।

ऐसे में इन दो उदाहरण को देखते हुए यह क्यों न मान लिया जाए कि आने वाले वक्त में इसका खामियाजा बीजेपी और मोदी को भुगतना पड़ेगा। खैर अंजाम जो भी हो लेकिन इतना तय है कि आज हमारे अंदर सहन करने की झेलने की और बर्दास्त करने की क्षमता कम हो रही है। यह अगर सही है और बदलाव की हम सोचते भी हैं तो भी बहुत जल्दबाजी कर बैठते हैं। ऐसे में हमें गंभीर होकर सोचने की जरूरत है।

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