कांग्रेस ने अपना 84 वां अधिवेशन मनाया। इस दौरान अध्यक्ष के तौर पर न सिर्फ राहुल गांधी बल्कि अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी जमकर गरजे। मोदी, बीजेपी और आरएसएस के साथ कई अन्य मुद्दों को भी उठाया गया। बुकलेट लांच किया गया और अन्य प्रस्तव भी पारित हुए। मीडिया कवरेज भी जबरदस्त हुई और इस रूप को देखने के बाद अब लोग एक बार फिर यह कहने लगे हैं कि अब वाकई कांग्रेस जगी हुई लगती है और जोश में लगती है। अब शायद राहुल मोदी को टक्कर दे सकें। अब शायद कांग्रेसी नेता अपने गलतियों से सिख चुके हैं। इसके अलावा और भी न जाने कितने शायद और काश पर बात हो रही है।


अब बात करते हैं कांग्रेस के इस मंच से दिखाए गए जोश पर। इस दौरान हर कांग्रेसी नेता उत्साह से लबरेज दिखा। सभी मे आगे बढ़ बोलने और मोदी सरकार की कमियों को गिनाने की होड़ लगी दिखी लेकिन जब यही बात चुनाव प्रचार के दौरान जन जन तक पहुंचने की बात आती है तो न सिर्फ राहुल सुस्त पड़ जाते हैं बल्कि दूसरे कांग्रेसी भी नदारद ही नजर आते हैं।

इसके अलावा अगर नजर आ भी गए तो अपने अति उत्साही बयान कहें या हताश होकर दिए बयान की वजह से राहुल और कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर जाते हैं। गुजरात चुनाव इसका बेहतरीन उदाहरण है जहां मणिशंकर और सिब्बल पार्टी को ले डूबे। साथ ही पूर्वोत्तर में राहुल अकेले ही नजर आए। ऐसे में बस यही जोश न सिर्फ मंच से राहुल में दिखना चाहिए बल्कि ऐसे ही मुद्दों की बात कांग्रेस को चुनावी मैदान में भी इसी आक्रामकता से रखनी चाहिए। तभी शायद कांग्रेस का कुछ भला हो सके।