जब जब कोई एक राष्ट्रीय दल सत्ता में होता है तब तमाम विरोधी दल या क्षेत्रीय दल एकजुट होने के प्रयास में लग जाते हैं। यह आज का माहौल है। हालांकि विपक्षी एकजुटता का यह प्रयास कोई नया नही है। यह लगभग तीस साल पुराना है लेकिन एक चीज जो इसमे बिल्कुल नई है वह है कि आज तक विपक्षी एकजुटता की बात उत्तर भारत,या यहां के नेताओं द्वारा उठाई जाती रही है लेकिन इस बार यह मुद्दा उठाया है दक्षिण के तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने और तो और कुछ दलों ने उनके बयान के बाद आश्वासन और स्वीकृति तक दे दी है। ऐसे में सवाल है क्या होगा इस बार तीसरे मोर्चे के अंजाम?


कांग्रेस और बीजेपी के अलावा मोदी और राहुल के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने की यह कोशिश नई बिल्कुल नही है। इससे पहले 2009 और 2014 में भी ऐसे सुगबुगाहट देखने को मिली थी। इसमे कई क्षेत्रीय दल शामिल भी हुए थे लेकिन आज के बदले माहौल में अब तक केसीआर के बयान का समर्थन सिर्फ कुछ दलों ने किया है। जिसमे ओवैसी, ममता बनर्जी, हेमंत सोरेन जैसे नेताओं के दल शामिल हैं। ऐसे में देखना है कि चुनाव में अभी एक साल रहते गठबंधन बनाने के इस आगाज़ का अंजाम क्या होता है और कितने दल गैर बीजेपी गैर कांग्रेसी सरकार आने के खिलाफ किस हद तक इन्हें चुनौती दे पाते हैं।