मौत कब किसके लिए कैसे आ जाये यह कहना और समझना मुश्किल है। इसके कई उदाहरण हम रोज देखते हैं। कभी जीने की आस धरी रह जाती है और मौत दबे पांव आकर अपना काम कर जाती है या कभी जीने की इच्छा खत्म होने के बावजूद हमें जीने को विवश कर देती है। ऐसी ही एक घटना पिछले साल महाराष्ट्र में देखने को मिली थी जब किसान आत्महत्या जैसे गंभीर मसले पर एक नाटक का मंचन किया गया और इस मंचन के दौरान अपने गले ने फंदा डाल जो इंसान भाग ले रहा था वह सच मे झूल गया और अभिनय करते हुए मर गया।

यह घटना महाराष्ट्र के नागपुर जिले की है जहां बैकुंठ चतुर्दशी के अवसर पर शोभा यात्रा निकाली गई थी। इसी में किसान आत्महत्या को दर्शाने के लिए एक झांकी सजाई गई थी जिसमे एक कलाकार मनोज धुर्वे अपने गले मे हल से लगे हुए फंदे को गले मे डाले एक ट्रेक्टर पर खड़ा था। अचानक ट्रेक्टर ने जर्क लिया और फंदा उसके गले मे कस गया जिससे उकी मौके पर ही मौत हो गई। नाटक का यह मंचन एक दुखद हकीकत में बदल गया। इसलिए शायद कहा गया है सावधानी हटी और दुर्घटना घटी या होनी को जो मंजूर है वह होकर रहेगा।