गाँवों की अपेक्षा शहरों में ज्यादा बढ़ रहा आत्महत्या का चलन

आंकड़े यही कहते हैं कि लाख पिछड़ेपन के बावजूद गांवों के लोग शहरों की अपेक्षा ज्यादा खुश हैं।

भारत गाँवों का देश है लेकिन आज हालात बिल्कुल उलट हैं। हम विकास की अंधी दौड़ में ऐसे शामिल हो चुके हैं जहां शहरों को स्मार्ट बनाने की बात की जाती है, गांवों को कोई नही पूछता। गांव की बदहाली की यही एक बड़ी वजह भी है। सही मायने में देखे तो जिस भारत की पहचान गांव से थी आज आधुनिकता की आड़ में खोते जा रहे हैं। आज असल गांव विलुप्त हो चुके हैं और वहां भी शहरीकरण हावी हो चुका है। हालांकि कई मामलों में गांव आज भी शहरों से आगे हैं।

जिस देश मे एक लाख से ज्यादा लोग प्रति साल आत्महत्या कर लेते हैं वहां गांवों की स्थिति फिर भी ठीक है। अगर किसान आत्महत्या के आंकड़ों को अलग कर दें तो हर वर्ग के आत्महत्या के आंकड़े यही कहते हैं कि लाख पिछड़ेपन के बावजूद गांवों के लोग शहरों की अपेक्षा ज्यादा खुश हैं। वह न अंधी दौड़ में शामिल हैं, न काम का अतिरिक्त बोझ लेते हैं, न उनपर प्रदूषण का प्रभाव न ही वह उस समाज का हिस्सा हैं जहां पड़ोसी तक आपको नही पहचानते। वहां के लोग आज भी गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के बावजूद शहरों की तुलना में हमसे कहीं ज्यादा खुश हैं। ऐसे में भारत की यह असल पहचान ही आत्महत्या के लिए बदनाम भारत की इज़्ज़त बचाती नजर आ रही है।

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