क्या फिल्मों से बढ़ रहा है आत्महत्या का दौर?

भले ही फ़िल्म शुरू होने से पहले यह लिखा जाता हैं कि इस फ़िल्म के सारे पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं इसके बावजूद लोग इसे सच मानते हैं या यकीन कर लेते हैं।

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फिल्में हमारे समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। आज हम ब्रांडेड कपड़े से लेकर स्टाइल हर चीज फिल्मों से सिख रहे हैं। फिल्मों में प्रयोग किये गए अभिनेता या अभिनेत्री के कपड़े तरवन्द में होते हैं। उनके डॉयलोग हम आम जीवन में कॉपी करते हैं। ऐसे में आत्महत्या के लिए क्या फिल्में जिम्मेदार हैं? यह सवाल हमेशा से सभी के मन मे उठता आया है। आइये इसी पर आज कुछ चर्चा करते हैं।

जैसा कि हमने ऊपर बताया कि फिल्मों का हमारे समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है साथ ही हमारे जीवन मे भी फिल्में गहरा छाप छोड़ती हैं। हम किसी फिल्म का समर्थन या विरोध भी तो खुद से जोड़ कर ही करते हैं। ऐसे में यह मानना कहीं से गलत नही की आत्महत्या जैसी प्रवृति को बढ़ाने में फिल्मों का बड़ा योगदान है। भले ही फ़िल्म शुरू होने से पहले यह लिखा जाता हैं कि इस फ़िल्म के सारे पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं इसके बावजूद लोग इसे सच मानते हैं या यकीन कर लेते हैं। फिल्मों के हिंसक सीन भी ऐसे मामलों को बढ़ाने और समाज को हिंसक बनाने में आगे हैं। ऐसे में समाज को आईना दिखाने की बात करने वाली फिल्मों में समाज के प्रति संदेश होना चाहिए द्वेष नही, सीख होने चाहिए सवाल नही।

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