बुंदेलखंड जहां वादों की बरसात में सिर्फ राजनीति की फसल लहलहाती है, किसानों की नही

बुंदेलखंड यूपी और मध्यप्रदेश के 13 जिलों से बना वह इलाका है जहां किसान सबसे ज्यादा त्रस्त हैं। एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी तरफ अकर्मण्य सरकार है। यह इलाका आत्महत्या से ऐसा अभिसप्त है कि हर घर की एक ही कहानी है। हर तरफ बदहाली का बोल बाला है। खेतों से ज्यादा पानी आंखों में है। जमीन बंजर होती जा रही है और जिन्दगी बदरंग। दोनों ही राज्यों से लगे इस इलाके में किसी भी सरकार का ध्यान नही है लेकिन हां यहां वादों की बरसात में वोट को फसल खूब लहलहाती है।

बुंदेलखंड के लिए हर बार चुनाव से पहले लंबे चौड़े वादे हर दल द्वारा किये जाते हैं लेकिन इस इलाके की तकदीर बदलने के मकसद से आज तक ऐसा कुछ होता नही दिखा जिससे उम्मीद जगी हो। इस इलाके में कई किसान सपरिवार काल के गाल में समा गए। बूढ़े बुजुर्गों को छोड़िये इस माटी के बच्चे भी तकदीर को कोसते हुए फंदे पर झूल गए। हालात ऐसे बने हैं कि लोग अपनी घर जमीन छोड़ कर पलायन कर रहे हैं, सब कुछ रहते हुए भी मजदूर बनने को मजबूर हैं। ऐसे में सरकार से उम्मीद है इसे गंभीरता से ले और बुंदेलखंड को पुनः बुलंद बनाने की दिशा में काम करे।

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