मध्यप्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसको लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू भी कर दी है और पक्ष-विपक्ष जम कर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने का दौर शुरू कर चुके हैं हालांकि अभी तक न मुद्दे नजर आ रहे हैं न विकास और जनता से संबंधित कोई बात किसी भी दल द्वारा उठाई जा रही है। ऐसे में सवाल है कि क्या राज्य में किसान आत्महत्या का मुद्दा चुनावी मुद्दा बनेगा या बस जात-धर्म और व्यक्तिगत बातों की बुनियाद पर चुनाव लड़ा जाएगा।

किसान आत्महत्या अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश के लिए भी एक बड़ा मुद्दा रहा है। साथ ही सैकड़ों किसान हर वर्ष यहां कर्ज के बोझ से दब कर अपनी जान गंवा रहे हैं। सरकारी नीतियों का घोर अभाव है और शायद सरकार इस मसले पर गंभीर भी नही है यही वजह है कि इसको गंभीरता से नही लिया जा रहा न कोई ठोस कार्ययोजना बनाई गई। खैर अभी तो वक़्त बाकी है लेकिन बयानबाजी के इस होड़ में भी इस गंभीर मुद्दे का गायब होना अपने आप मे एक बड़ा सवाल है।