किसानों की लाश पर राजनीति कब तक

कर्ज़ माफी, सब्सिडी, खाद पानी हर तरह से यहां तक कि फसल नुकसान से लेकर हर वह कड़ी इस वादे का हिस्सा होती है जिससे किसान मोहित हो सके लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात पर आकर खत्म हो जाता है।

जब भी देश या किसी राज्य में चुनाव होते हैं तब लंबे चौड़े वादे होते हैं। खास कर किसानों को बड़े बड़े सपने दिखाए जाते हैं, वह रिझाये जाते हैं लेकिन हकीकत यह है कि आज तक कोई ऐसी सरकार नही आई किसी भी राज्य में जिसने वाकई किसानों की परवाह की है। कर्ज़ माफी, सब्सिडी, खाद पानी हर तरह से यहां तक कि फसल नुकसान से लेकर हर वह कड़ी इस वादे का हिस्सा होती है जिससे किसान मोहित हो सके लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात पर आकर खत्म हो जाता है।

आज देश के अधिकतर राज्यों में किसान बदहाल है आत्महत्या करने को विवश है, इसकी गवाही खुद सरकारी आंकड़े भी देते हैं लेकिन इन सब के बावजूद कभी किसानों के नाम पर तो कभी उनकी लाश पर सिर्फ राजनीति ही हुई है। आज बेशक कई योजनाएं चल रही है लेकिन उसका लाभ शायद ही किसानों को मिला है। किसी भी राज्य सरकार के लिए किसान प्राथमिकता है ऐसा नही लगता, क्योंकि अगर ऐसा होता तो खुद सरकारी आंकड़े ही बता जाते। स्थित्ति बहुत चिंतनीय है,अन्नदाता मर रहा है और वोटों के भूखे राजनीति में लगे हैं। सोचिए कैसे बने न्यू इंडिया?

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