सैन्य ताकत बेमिसाल फिर भी भारत बेहाल, क्यों?

भारतीय सेना के पराक्रम और वीरता की बराबरी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. हालांकि राजनीति ने सेना को पंगु बना दिया

भारत की सैन्य ताकत किसी से छुपी हुई नही है. दुनिया का हर देश यह बात जानता और मानता है कि भारतीय सेना के पराक्रम और वीरता की बराबरी करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. हालांकि राजनीति ने सेना को पंगु बना दिया वरना कश्मीर भी हमारा होता और आज हजारों जवान जो देश के लिए शहीद हो गए वह भी हमारे बीच होते. सैन्य शक्ति में हमसे ज्यादा हथियार और संख्या वाले देश हो सकते हैं लेकिन जो देशभक्ति भारत की सेना में है शायद वह विरले ही दुनिया के किसी अन्य देश की सेना में देखने को मिलती है. इसके बावजूद आज हम आतंकवाद, नक्सलवाद, और कश्मीर जैसे मुद्दों को सुलझाने और इनसे निपटने में विफल रहे हैं.

आज कश्मीर समस्या अगर नासूर बनी है तो इसमें राजनीतिक दलों और सरकारों का बड़ा योगदान रहा है. वोट के लिए राजनीति करते वाले दल कुर्सी की लालच में ऐसे पड़े की आतंकियों के जयकारे और पाकिस्तान के गुणगान में व्यस्त हो गए. इसके अलावा जब भी बात इससे निपटने की हुई तब देश को अँधेरे में रख कर, सेना के हाथ बाँध दिए गए. खुली छुट नही मिली, न कभी सख्त कारवाई हुई, अगर कुछ हुआ तो वह था कड़ी निंदा, मुहतोड़ जवाब, और तो और यह जवाब सुन देश के लोग खुश होते रहे, टीवी चैनल के स्टूडियो से पाक को ललकारा जाने लगा और प्रिंट मीडिया हथियारों और सैनिकों के साथ परमाणु बम की गिनती गिनने में लग गया. ऐसे में कुल मिलाकर एक ही कारण नजर आता है कि अगर सेना को एक बार खुली छूट दे दी जाती, जन भावनाओं का सम्मान कर लिया जाता और पाक के नापाक इरादों को बुलंद हौसलों से मात दी जाती तो न सेना के जवान शहीद होते, न राजनीति के आकाओं को राजनीति के चक्कर में अपना स्तर नीचे गिराना पड़ता.

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