मालदीव इन दिनों गंभीर सत्ता संघर्ष और राजनीतिक उठापटक के दौर से गुजर रहा है। देश मे आपातकाल लागू है। पूर्व राष्ट्रपति इस मामले में भारत से हस्तक्षेप चाहते हैं वहीं वर्तमान राष्ट्रपति के भेजे दूत को समय देने से भारत ने इनकार कर दिया है।

जनता सड़कों पर है। पर्यटन के लिए मशहूर इस देश मे टूरिस्ट आने से परहेज कर रहे हैं। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इस संघर्ष का अंजाम क्या होगा? क्यों भारत किसी भी तरह के समर्थन, विरोध या कार्रवाई से बचता नजर आ रहा है?

इन बातों से पहले आपको यह बता दें कि सत्ता संघर्ष का यह कोई पहला मामला नही है। इससे पहले भी कई सरकारें आईं और गईं। ऐसे ही एक विद्रोह और तख्तापलट की कोशिश के दौरान राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते भारत ने 1988 में मालदीव को सैन्य सहायता उपलब्ध करा चुका है लेकिन इसके बावजूद भारत इस बार क्यों बच रहा है यह समझ से परे है। इसके अलावा मालदीव यह लगातार दोहरा रहा है कि उसने सबसे पहले भारत से ही मदद मांगी क्योंकि वह भारत को अपना सबसे करीबी सहयोगी मानता है।

अब बात भारत की करें तो, भारत प्रत्यक्ष या सीधे तौर पर कोई कार्रवाई इसलिए नही करना चाहता क्योंकि वहां जो हुआ वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में कहीं से सही नही है। अब बताते हैं कि वहां हुआ क्या है।

दरअसल वहां की सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद सहित कई राजनीतिक बंदियों की रिहाई के आदेश जारी किया था, जिसे वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने मानने से इनकार कर दिया और जजों की गिरफ्तारी के साथ आपातकाल के ऐलान कर दिया। जिसके बाद हालात बिगड़ गए।

दूसरी बात यह कि पूर्व राष्ट्रपति नशीद खुद देश के बाहर निर्वासन की जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं, उनका झुकाव भारत के प्रति जरूर है लेकिन वह सत्ता से बाहर हैं। इसके अलावा अब्दुल्ला यामीन सरकार का झुकाव अन्य पड़ोसी देशों की तरफ भारत के मुकाबले ज्यादा रहा है। यह देश भले ही छोटा है लेकिन इसका सामरिक और कूटनीतिक महत्व काफी ज्यादा है।

बदलते वक्त में यह भारत की जरूरत बन सकता है ऐसे में भारत फिलहाल वेट एंड वॉच की स्थित में ही खुद को बेहतर मान रहा है। सैन्य टुकड़ियों को तैयार रखा जरूर है लेकिन सीधी कार्रवाई से बचना चाहता है। यही वजह है कि भारत मालदीव के समर्थन या विरोध के अलावा किसी भी जल्दबाजी से बचता नजर आ रहा है।