अभिनेता से नेता यूँ तो कई बने, आये और गए लेकिन कुछ ऐसे भी बने जो छा गए. रजनीकांत के राजनीति में आने के ऐलान के बाद अब यह मुद्दा एक बार फिर सब की ज़बान पर है कि क्या वह एक सफल नेता बनेंगे? राजनीति में क्या उन्हें वह मक़ाम मिलेगा जिसके लिए वह आ रहे हैं? क्या वह फिल्मों द्वारा अर्जित सफलता राजनीति में दोहरा सकेंगे? और न जाने कितने सवाल. लेकिन हम आपको यह पूरे यकीन से कह सकते हैं कि राजनीति में रजनीकांत का भविष्य सुनहरा है और तमिलनाडु के साथ दक्षिण भारतीय राजनीति में आने वाले समय में बड़ा बदलाव सिर्फ रजनीकांत की वजह से आ सकता है.

क्या है वजह-
यह आकलन हम यूँ ही नहीं दे रहे. इसके पीछे कई वजहें हैं. जिनमे रजनीकांत का स्टारडम, उनकी फैन फॉलोइंग, उनकी योग्यता, उनकी लोकप्रियता और उनकी एक अलग पहचान जैसी काबिलियत उन्हें राजनीति में वह सब दिलाएगी जिसकी कल्पना से ही शायद द्रविड़ राजनीति की धुरी बनें दल घबरा रहे हैं. जयललिता के निधन के बाद और द्रमुक प्रमुख करूणानिधि की सक्रिय राजनीति से दूरी के बीच जो शुन्यता बनी है उसमे रजनीकांत का उदय बहुत हद तक आसान दिख रहा है.


जयललिता के बाद जहाँ एआईडीएमके में राजनीतिक विरासत को लेकर शशिकला गुट और कई अन्य गुटों में लड़ाई और आपसी कलह देखने को मिली वहीँ डीएमके में करूणानिधि के बाद उनके बेटे एम् के स्टालिन को अलागिरी से तगड़ी चुनौती मिल रही है इसके अलावा उपचुनाव में शशिकला के भतीजे दिनाकरण की जीत भी यह बताने को काफी है कि दलों की आपसी कलह वाली रजनीति अब तमिलनाडु में बीते दिनों की बात हो चुकी है. ऐसे में कोई वजह नहीं दिखती की रजनीकांत को अपेक्षित सफलता न मिले. आकी आने वाले दिनों में समर्थकों और संगठन के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाएगा कि राजनीतिक अनुभव न होने का कितना नुकसान उन्हें उठाना पड़ता है लेकिन कुछ नेगेटिव बातों को छोड़ दें तो फिलहाल ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जिससे यह कहा जाए की रजनीकांत की सफलता पर कोई संदेह है.