दिल्ली में प्रदूषण का बोलबाला है. स्वास्थ्य के लिहाज से इसे काफी खतरनाक बताया जा रहा है. स्कूलों में छुट्टी है. हवाई और रेल सेवाएं अस्त व्यस्त है. रोजमर्रा के लिए बाहर जाने आने वालों में इसका खौफ है लेकिन न तो इस खतरे का सही अंदाजा दिल्ली सरकार को है न ही केंद्र सरकार को यही वजह है कि बयानबाजी और ट्विटरबाजी से बात आगे नहीं बढ़ सकी है. मुख्यमंत्री जहाँ ऑड-इवन फॉर्मूले के भरोसे नजर आ रहे हैं वहीँ केंद्र कृत्रिम बारिश की मांग ठुकरा चूका है. ऐसे में सवाल है कि क्या सिर्फ ऑड-इवन से इस खतरनाक प्रदूषण और स्मॉग से राहत मिल जाएगी या बस सब भगवन भरोसे है.

आपको यहाँ यह बताना आवश्यक है कि इससे पहले भी दिल्ली इन विकत परिस्थितियों का सामना कर चुकी है. सरकारें तब भी सो रही थी और आज भी यह अनवरत जारी है लेकिन इस बार जिस तरह प्रदूषण का लेवल 30 गुना ज्यादा बढ़ा है वह शायद पहले कभी नहीं हुआ. आप इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि दिल्ली में सांस लेने का मतलब आप 70 सिगरेट के बराबर धुआँ अंदर ले रहे हैं. यह तो बात हुई इसके असर कि अब बताते हैं इससे होने वाले और खतरनाक बिमारियों के बारे में. स्मॉग के दौरान आपके आँखों में जलन,सर में दर्द,सांस लेने में दिक्कत और खांसी हो सकती है. इसके अलावा यह अस्थमा,टीबी,और दिल के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है.

नुकसान के बाद आपको यह भी बता दें कि दिल्ली के अलावा स्मॉग का प्रकोप दुनिया के कई अन्य देशों में भी है. यह पाकिस्तान,चीन और अफगानिस्तान समेत कई देशों में देखने को मिला है लेकिन जिस तरह भारत में इसके लिए ज्यादा गाड़ियों और किसानों के पराली जलाने को जिम्मेदार माना गया ऐसा और कहीं नहीं हुआ. साथ ही चीन ने इस पर 72 घंटे के अंदर काबू भी पा लिया. लेकिन हमें इससे क्या हम तो बस जिम्मेदारी लेने के बदले दूसरों के सर मढ़ना जानते हैं. सरकारों में आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है और इन सब में जनता की जिंदगी से जुड़ा यह मुद्दा गौण है.

चीन ने स्मॉग से निपटने के लिए 72 घंटे तक सभी तरह के निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी, गाड़ियों को बंद किया गया,कल कारखानों में उत्पादन रोक दिया गया या सिमित कर दिया गया इसके अलावा वहां तकनीक का प्रयोग करते हुए कृत्रिम बारिश भी कराइ गई. दुनिया के सबसे भीड़भाड़ वाले शहरों में से एक बीजिंग की फिजा खिल उठी और स्मॉग से मुक्ति मिल गई. चीन यह कारनामा बीजिंग ओलम्पिक से पहले भी कर चुका है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या हम ऐसे कदम नहीं उठा सकते. अगर नहीं तो क्यों?