राजनीति

तीन साल अर्थव्यवस्था बदहाल, क्या ऐसे बनेगा न्यू इंडिया?

नोटबंदी के साल भर होने को हैं वही इस दौरान वस्तु और सेवा कर भी लागू कर दिया गया.इनके तमाम फायदे भी प्रचारित किये गए लेकिन अब जो आंकडें आये हैं वह सरकार के लिए निराशा,व्यापारियों के लिए हतासा,विपक्ष के लिए एक मुद्दा और आम लोगों के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं. हम बात कर रहे पहली तिमाही के नतीजे कि,जिसके अनुसार निर्यात में भारी गिरावट दर्ज कि गई है.इसके अलावा यह जीडीपी का  जितना प्रतिशत है वह आज से 14 साल पहले हुआ करता था. यहाँ यह भी सोचने योग्य बात है कि 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद निर्यात 24 लाख करोड़ पर अटका पड़ा है. यह 2011-12 में भी इतना ही हुआ करता था. निर्यात में स्थिरता के कारण भी भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है. दुनिया के बाज़ार में निर्यात बढ़ रहा है लेकिन भारतीय उत्पाद प्रतियोगिता में टिक नहीं पा रहे हैं. इससे यह भी स्पष्ट है कि सरकार कि महत्वाकांक्षी योजना मेक इन इंडिया भी फ्लॉप साबित हुई है.

 

हमने आपको अपनी पहली ही लाइन में इसके दो बड़े कारण बता दिए हैं.नोटबंदी इसकी बर्बादी का कारण है. हमसे पहले आप ने नोटबंदी के कई नुकसानों को किसी न किसी अख़बार में थोड बहुत तो पढ़ा ही होगा,कई अर्थशास्त्रियों ने भी इसके नुकसान के बारे में बात कि थी लेकिन इन सब के बावजूद सरकार को यह दूरगामी परिणाम देने वाले फैसले नजर आये थे. रविश कुमार लिखते हैं कीटनाशक की तरह नोटबंदी भी अर्थव्यवस्था नाशक है, जिसका छिड़काव कीट की जगह बीज पर कर दिया गया. उन्होंने बिजनेस स्टैंडर्ड के कृष्ण कांत की रिपोर्ट को पढने कि भी सलाह दी है और यह रिपोर्ट वाकई अच्छी है.जो पूरा लेखा जोखा बताती नजर आ रही है. कुल मिलाकर अगर हम देखे तो मोदी सरकार के तीन साल बस मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर बेहतरीन दिख रहे हैं.अर्थव्यवस्था जहाँ चौपट होने के प्रमाण चीख चीख कर दे रही है वही पेट्रोल डीजल,रसोई गैस महंगाई से भी बुरा हाल है. अब देखना है दो सालों में मोदी सरकार इन सब से निपटने को क्या नयी योजना और कार्यक्रम बनाती है या बस मीडिया और मन कि बात के नाम ही 2022 में न्यू इंडिया का सपना संजोती है.

Vijay Rai
Human by Birth,Hindu by Religion,Indian by Nationality,Politics is my choice,journalism-my passion.

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