​8 नवम्बर के बाद से नोटों के लिए मची आपाधापी अब कुछ कम होती नज़र आ रही है।ऐसे अलग अलग न्यूज़ चैंनलों के हिसाब से यह अलग अलग है लेकिन मैं जो कुछ देख और समझ पा रहा हूँ उससे यही निष्कर्ष निकल पाया की मेरे आसपास और जिस रास्ते मैं हर दिन लगभग 3 घंटे का सफर पूरा करता हूँ,उसके आसपास या अंदर आने वाले बैंक और एटीएम की लाइन अब खाली है,एटीएम में पैसे अब आसानी से मिल पा रहे हैं और पिछले हफ्ते तक यह भीड़ लगभग 1 किलोमीटर लंबी और सुबह 7 बजे से संघर्ष करती नज़र आती थी।आमलोगों और खासलोगों के बीच की दूरी, एटीएम की भीड़ और अर्थव्यवस्था के चौपट होने की दुहाई देने वाले चैनल,अपने अपने आकलन,अक्ल और आंकड़े जुटाने वाले पता नहीं कहाँ से ये ला रहे हैं और पक्ष और विपक्ष में गीत गा रहे हैं श्रोत और सूत्र क्या है भगवान् ही जानें।

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विमुद्रिकरण भारत में पहली दफा नहीं है लेकिन पहली दफा नीति और नियत सही है।दूसरे देशों में सफलता पूर्वक इसे आज़माया जा चुका है,कम से कम ये इसके सकारात्मक पहलू हैं।दूसरी तरफ तैयारी और लागू करने की बात है तो मेरे नजरिये में प्रधानमंत्री द्वारा मांगी गई 50 दिनों की समयसीमा में सब अस्थिर हो जाना चाहिए इसके कारण मैं पहले ही बता चुका हूँ।

वेनेज़ुएला में वहां की सरकार ने कमजोर होते मुद्रा को प्रयोग से हटाने का फैसला लिया लेकिन वहां स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा है,इससे यह स्पष्ट है की भारत की सवा सौ करोड़ की आबादी ने इस फैसले के पक्ष में अपनी मौन सहमति दी है,नहीं तो यहाँ के हालात वेनेज़ुएला से कई गुना ज्यादा बिगड़ सकते थे।

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राजनीतिक पार्टियों को छूट के बाद मचे हो हल्ला के पीछे भी कुछ न कुछ तो छुपा है अगर हम विरोध की बात करें तो वैसे ही लोग इसके खिलाफ सबसे ज्यादा नज़र आये हैं जिनके दामन पर या तो खुद घोटालों के दाग हैं,अपना सब कुछ गवां चुके हैं,या काले धन को बढ़ावा देने में योगदान देते रहे हैं।इन बातों का असर चुनावों में स्पष्ट हो जायेगा की किसने कितना खोया है।2 – 4 करोड़ में सीट बेचने वाले नेता और 6 महीने पहले से रात दिन चुनाव की तैयारी करने वाले नेता मौन हैं,इसका संकेत स्पष्ट है कि विमुद्रिकरण के इस दौर में नुकसान हुआ है।

आमलोगों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करने का प्लान भी फ्लॉप साबित हुआ है,नोटबंदी के फैसले को अब तक सही साबित करने में केंद्र सरकार, वित्त मंत्रालय,आरबीआई, सहित पुरे देश में कार्यरत बैंक  कर्मचारियों का अथक प्रयास और मेहनत का जबरदस्त योगदान रहा है।

विपक्ष में साफ़ छवि के नेता और जनता के हित के लिए सोचने वाले नेता पहले ही इसका समर्थन कर चुके हैं इसका दूसरा कारण जनता की नब्ज समय रहते पकड़ना और उनके फैसले से न चाहते हुए समर्थन देना एक मज़बूरी भी हो सकती है।

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बहरहाल आंकड़े बहुत हैं हर सिक्के के दो पहलु होते हैं फायदा या नुकसान वो बाद की और लंबे समय में नज़र आने वाली बातें हैं लेकिन अभी तक बैंकों में जमा हुए रूपए और आयकर विभाग की कारवाई में जब्त हुए रूपए और गहने ये बताने को काफी हैं इसका असर कहाँ और किस पर हो रहा है साथ ही साथ ग्रामीण जनता के जन धन खतों में आये रूपए भी गरीबी और भुखमरी वाली भारत की छवि को शायद सुधरने का काम करेंगे।उम्मीदें और अपेक्षाएं अनंत हैं लेकिन कुछ दिन की कठिनाई और यह साहसिक फैसला आने वाले दिनों के लिए वरदान साबित हो ऐसी मेरी आशा है।
विजय राय