अपने कुछ महीने पहले लिखे एक लेख में मैंने कोटा के काँटे शीर्षक से राजस्थान के कोटा शहर के हाल और वहां कोचिंग के रूप में चल रही शिक्षा की फैक्टरियों की चर्चा की थी,जिसमे मैंने माँ पापा के सपनों के लिए घर द्वार,सपने,अपना समाज,अपनों का संसार छोड़ हज़ारों किलोमीटर घर से दूर रह रहे बच्चों और उनकी सोच को बताने की कोशिश की थी।खैर यह बात और कहानी अभी भी प्रासंगिक है और बदस्तूर जारी है।लेकिन बस एक कोटा और इंजीनियर डॉक्टर बनाने के ही सपने नहीं हैं,इन सब से बचे हुए लोगों के लिए माँ बाप के मन में एक और ऐसा अरमान है जो सबसे ज्यादा आता है वो है लाल के लिए लाल बत्ती का सपना।

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जी हाँ, लाल के लिए लाल बत्ती यानि यूपीएससी,और इससे भी आसान शब्दों में आईएएस और आईपीएस बनने का सपना,यह बिहार देश के उत्तर भाग में स्थित राज्यों जैसे बिहार,यूपी में कुछ ज्यादा ही प्रचलित है,इसके पीछे मुझे दो वजह समझ आती है,पहला की देश में सबसे ज्यादा लोग इस प्रतिष्टित सेवा में यहीं या इन्ही राज्यों से आते हैं दूसरा है,आन में जान देने या दूसरे की सलाह मान कर ख्वाब देखना।कोटा वाली परिस्थिति यहाँ भी बनती है,सैकड़ों हज़ारों माँ बाप दिल्ली सहित इलाहाबाद् और अपनी पॉकेट के हिसाब से लाल बत्ती को पाने के लिए भेजने वाली जगह तय करते हैं,कई जमीन जायदाद बेच कर तो कई लोन लेकर भी इस ख्वाब को बुनते हैं,नतीजा आने के लिए एक पूरी पंचवर्षीय योजना तक इंतजार किया जाता है और इन पांच सालों में एक अच्छे खासे लड़के की लाइफ उसके सपनों से दूर बस इसी फ़िक्र में बीतने लगती है कि अब आगे क्या?

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माँ का खाना, दोस्तों का रंग,मस्ती का संग,प्यार,तकरार,इन्कार सब भूल कर जिंदगी THE HINDU ,ECONOMIC TIMES  और प्रतियोगिता दर्पण,कुरुक्षेत्र और संसार के पोलिटिकल और भूगौलिक नक़्शे में बदलने लग जाती है।अब मानव स्वभाव है 29 राज्यों और कई देशों के लोगों को देख कर इमोशन भी जागने लगते हैं ठीक उसी पल घर की याद सपने क़र्ज़ याद आ जाते हैं।बुक के नाम से लेकर कोचिंग टेस्ट और इतिहास की बकवास तारीखें सब इमोशन भुला लाल बत्ती बार बार याद दिलाती हैं,अल्हड गांव का घुमंतू लड़का अब मिनी मुरारी बापू बन कर सब भूलते हुए मेट्रो में भी ऐसे घूमता है कि लोग बिना उससे पूछे ही बता दें कि बेटा यूपीएससी के कैंडिडेट हो,पहचान वो खुद दे जाता है,एक हाथ में नोट्स,कान में हैडफ़ोन में बजता फालतू के रेडियो गाने,चेहरे पर सन्नाटा का भाव,आँखों में उदासी और समय न गंवाने वाला कमिटमेंट,लेकिन इन सैकड़ों हज़ारों या लाखों में कुछ लोग सफल होते हैं बाकी दूसरी राह तलाशने निकल पड़ते हैं।घर वालों के सपनों की अर्थी भी इसी के साथ निकल पड़ती है साथ ही साथ उसके खुद के देखे हुए सपनों को पूरा करने का वक़्त भी नहीं बच पाता है,तैयारी के समय रोज सोचा जाता है कि आज पापा मम्मी को बोल दें कि हमसे न हो पायेगा लेकिन फ़ोन आते ही संस्कार और प्रणाम करने से ज्यादा हो ही नहीं पाता है।

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कुल मिलाकर निष्कर्ष मैंने अपनी तरफ से यही निकाला की जो यूपीएससी के कोचिंग क्लास ले रहे हैं और अपने होर्डिंग पर दावा करते हैं की वो फलाने फलाने एग्जाम में क्वालीफाई हुए या चुने गए तो वो यहाँ क्या कर रहे हैं?दूसरी अहम् बात जो दिमाग में आती है कि लाल बत्ती हो या कोटा के ख्वाब हों सामाजिक सोच एक दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही है।तीसरी बात यह की या तो आज का युवा उद्देष्यविहीन है या संस्कार और शिष्टाचार कुछ ज्यादा ही है।खैर बात जो भी हो इन फालतू के अरमानों का नतीजा कभी-कभी काफी भयावह होता है और कभी-कभी काफी सुनहरा लेकिन यह सब निर्भर करता है हमारी अपनी सोच, मेहनत और लगन पर। सभी को अशेष शुभकामनायें।

इस पोस्ट का यथार्थ किसी का मजाक उड़ाना नहीं है बस सच्चाई को बयां करने की एक कोशिश मात्र है। यह मेरे अपने निजी विचार हैं, अन्यथा न लें।
विजय राय