दरबारों में ख़ामोशी है,हल मिला है सवालों को,
आज दादरी चिढ़ा रही है,कायर दिल्ली वालों को,
कहाँ गये अब राहुल भैया,कहाँ केजरीवाल गए,
किस बिल में आखिर छिपने को,कायर सभी दलाल गए,
रोती रहे दादरी पर वो चैनल वाले कहाँ गये?
कहाँ गया ढोंगी रवीश,वो खबर मसाले कहाँ गए,
काण्ड दादरी पर सब को अवसाद दिखाई देता था,
वो अख़लाक़ मियां सबका दामाद दिखाई देता था।

एक कवि ने यह कविता लिखी थी उसी से ली गई हैं ये कुछ लाइन,इस कविता की रचना तब हुई थी जब दिल्ली में एक डॉ नारंग जिनकी हत्या कुछ शांतिप्रिय अवैध बांग्लादेशियों द्वारा पीट पीट कर की गई थी।आज इसलिए यह कहना पड़ा क्योंकि अभी कुछ घंटों पहले दादरी कांड में मृतक के घर से मांस का कुछ टुकड़ा मिला था जिसे जांच के लिए मथुरा भेज गया उसकी रिपोर्ट आई है,तथा उसमे गाय या उसके बछड़े के मांस होने की पुष्टी भी हुई है,अब सवाल यह है की इस कांड पर विधवा विलाप,असहिष्णुता,अवार्ड वापसी,प्राइम शो,डिबेट करने वाले अब क्या कहेंगे।ब्जीद द्वारा कानून का हाथ में लेना गलत था और है लेकिन पुरे देश में लंबी बहस और असहिष्णुता जैसे मुद्दे छेड़ कर सदभाव बिगाड़ने की कोशिश करने वाले अब क्या कहेंगे?मुआवज़ा क्यों न वापस लिया जाए?क्यों न बयानवीर नेताओं पर भी करवाई हो?
प्रश्न बहुत हैं सवाल कम देखते हैं अब कितने बोलने वाले सामने आकर माफ़ी मांगेंगे और कितने थूक कर चाटने वाली परंपरा को जारी रखेंगे।
#विजय